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आज भी बरकरार है 'मुगल-ए-आज़म' का जादू

आज भी बरकरार है 'मुगल-ए-आज़म' का जादू

आधी सदी पहले भव्य और आलीशान सेट्स, शानदार नृत्यों और भावपूर्ण संगीत से सजी फिल्म 'मुगल-ए-आजम' रुपहले पर्दे पर आई थीं, लेकिन के. आसिफ के द्वारा निर्देशित यह फिल्म आज भी बॉलीवुड के निर्देशकों और तकनीशियनों को प्रेरित करती है।

'मुगल-ए-आजम' पांच अगस्त 1960 को प्रदर्शित हुई थी। जिसमें सलीम और अनारकली की ऐतिहासिक प्रेम कहानी को बेहद खूबसूरती से फिल्माया गया है।

पचास बरस पूर्व बनी इस फिल्म का कांच से बना 'शीश महल' एक अनोखा फिल्म सेट था। इसमें अभिनेता पृथ्वीराज कपूर ने अकबर के किरदार को बखूबी निभाया था। नौशाद का संगीत और शकील बदायूनी के गीत के साथ दिलीप कुमार और मधुबाला की जोड़ी ने इस फिल्म को भारतीय सिनेमा के इतिहास में एक मील का पत्थर बना दिया।

मशहूर फिल्मकार सुभाष घई का मानना है कि 'मुगल-ए-आज़म' जैसी खूबसूरत फिल्म दोबारा नहीं बनाई जा सकती। उन्होंने कहा कि यह सचमुच हिन्दी सिनेमा में एक अनोखी प्रेम कहानी पर आधारित फिल्म थी। लिहाज़ा यह हमेशा लोगों के दिलों में जिंदा रहेगी।

घई ने कहा कि हिन्दी सिनेमा के रुपहले पर्दे पर दिलीप कुमार और मधुबाला की जोड़ी जैसी आज कोई जोड़ी नज़र नहीं आती है। 'मुगल-ए-आज़म' के सेट्स और प्रत्येक कलाकार के लिए अलग-अलग कपड़े डिज़ायन किए गए थे। जिसके चलते यह फिल्म ऐतिहासिकता को दर्शाने में सफल रही थी।

इसके किरदारों के कपड़े तैयार करने के लिए दिल्ली से विशेष तौर पर दर्जी और सूरत से काशीदाकारी के जानकार बुलाए गए थे। हालांकि विशेष आभूषण हैदराबाद से लाए गए थे। अभिनेताओं के लिए कोल्हापुर के कारीगरों ने ताज बनाया था।

राजस्थान के कारीगरों ने हथियार बनाए थे और आगरा से जूतियां मंगाई गई थीं। फिल्म के एक दृश्य में कृष्ण भगवान की मूर्ति दिखाई गई है, जो वास्तव में सोने की बनी हुई थी।

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