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फूलों से गुलजार हो जाती है घाटी

फ्लोरा एवं फौना प्रेमियों के लिए यूं तो हिमालय में अनेक स्थान हैं, जहां वर्षा ऋतु में ही उनका आनन्द उठाया जा सकता है, परन्तु सबसे ज्यादा लोकप्रिय एवं प्रसिद्ध है वेली ऑफ फ्लावर्स अर्थात फूलों की घाटी। यहां ग्रीष्म ऋतु के बाद होने वाली बरसात में खिलते हैं फूल। नाना प्रकार के फूल तथा फूलों की खुशबू से यहां आने वाले पर्यटक मदहोश हो जाते हैं। फूलों के साथ अनेक प्रकार के औषधीय गुणों से युक्त पेड़-पौधे बारिश की बूंदों के साथ ही अपनी छटा बिखेरने लगते हैं। सितम्बर तक घाटी में फूलों का अलग-अलग नजारा देखने को मिलता है। जुलाई में खिलने वाले फूलों में पैंडीकुला, ग्रैंडीफ्लोरा तथा लिंगुलारिया प्रमुख हैं तथा अगस्त माह में मैरीगोल्ड, सनफ्लावर, जंगली गुलाब, लिली, छुई-मुई (टच मी नॉट), बटरकप तथा अनेक प्रकार के फूलों से घाटी प्रकृति प्रेमियों को अपनी ओर आकर्षित करती है। यहां खिलने वाले दुलर्भ फूलों में कमल, ब्लू पोपी तथा कोबरा सांप के आकर का कोबरा लिली हैं। इस मौसम में लगता है, मानो प्रकृति द्वारा फूलों की चादर बिछा दी गई हो। सितम्बर माह आते ही फूलों का रंग ब्राउनिश होने लगता है।

फौना प्रेमियों के लिए स्नो-लियोपर्ड, मस्क डीयर, हिमालयन रीछ, रेड फाक्स, लंगूर तथा भराल (पहाड़ी बकरी) देखने को मिल सकते हैं। इनके अतिरिक्त वैली को निहारते हुए अनेक प्रकार की तितलियों को उड़ते देखना आंखों को सुन्दर लगता है। इसलिए कहा जाता है कि इस घाटी में आकर जो सुकून और खुशी का एहसास होता है, वह अन्यत्र देखने को नहीं मिलता। 10 किलोमीटर लंबी एवं 2 किलोमीटर चौड़ी इस घाटी को प्रसिद्ध माउंटेनियर फ्रेंक स्मिथ ने सन 1931 में अपने ‘कामेट चोटी’ अभियान के दौरान दुनिया से परिचित कराया। वे यहां की सुंदरता से इतने प्रभावित हुए कि 1934 में दुबारा यहां आये और घाटी में रह कर यहां के फूलों एवं बनस्पतियों का न केवल विस्तृत अध्ययन किया, वरन् उन्हें इंग्लैंड भी ले गये। कहते हैं कि पांडवों ने भी अपने अज्ञातवास के दौरान यहां समय बिताया था। घाटी के मध्य में बहने वाले पुष्पावती नदी घाटी की सुंदरता को और भी बढ़ा देती है। फूलों की घाटी का ज्यादातर हिस्सा नदी के दायीं ओर स्थित है। यहां बहने वाले छोटे-छोटे नाले न केवल घाटी की सुंदरता को बढ़ाते हैं बल्कि नदी के बहाव को बढ़ाने तथा फूलों के खिलने में भी मदद करते हैं। वैली की सुंदरता को देखते हुए यूनेस्को द्वारा इसे वर्ल्ड हेरिटेज साइट का दर्जा दिया गया है तथा भारत सरकार ने इसे नेशनल पार्क घोषित किया है।

कैसे पहुंचें- निकटतम हवाई अड्डा जौली ग्रांट (देहरादून) है तथा दिल्ली से नियमित हवाई सेवा उपलब्ध है।

रेल- उत्तर रेलवे का हरिद्वार स्टेशन देश के प्रमुख शहरों से जुड़ा हुआ है।

सड़क-टैक्सी अथवा बस से हरिद्वार/ ऋषिकेश से बद्रीनाथ मार्ग पर स्थित गोविंद घाट पहुंच सकते हैं। गोविंद घाट से 13 कि.मी. की पैदल यात्रा कर 5-6 घंटे में घंघरिया पहुंच सकते हैं। पैदल यात्रा नहीं कर सकते हैं तो घोड़ों द्वारा जा सकते हैं। घंघरिया से वैली ऑफ फ्लावर्स 4 कि.मी. की दूरी पर है। सुबह चल कर सायंकाल तक वापिस घंघरिया लौटना पड़ता है, क्योंकि वैली में ठहरने की व्यवस्था नहीं है।

सावधानियां

मानसिक रूप से तैयारी एवं शरीरिक रूप से फिट होना जरूरी है। ट्रैकिंग में एल्टीटय़ूड सिकनेस आम बात है। अत: उससे बचाव के लिए फस्र्ट एड किट के अलावा सिरदर्द, बुखार तथा पेट से संबंधित बीमारियों व त्वचा के लिए (डॉक्टर की सलाह के अनुसार) दवाइयां अवश्य रखें। पदयात्रा के दौरान बारिश से बचाव के लिए रेन कोट, विंड चीटर, टॉर्च, वाटर बॉटल जैसी आवश्यक वस्तुएं जरूरी हैं। पथरीले रास्तों पर चलने के लिए हंटर शू उपयोगी होते हैं।

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