DA Image

अगली स्टोरी

class="fa fa-bell">ब्रेकिंग:

पाकिस्तान को गुस्सा क्यों आता है

पाकिस्तान की मौजूदा हुकूमत को भारत पर बहुत गुस्सा आ रहा है कि वह आतंकवाद की रट लगाये हुए कोई और बात करने को तैयार ही नहीं है। कई सारे मसले हैं जैसे कि कश्मीर मगर भारत टस से मस नहीं हो रहा। फिलहाल यह हुकूमत अमेरिका से भी नाराज है। अरबों डालर मदद के नाम पर देने के बाद वह कई तकाज़े कर रहा है कि आतंकवाद से लड़ो। उन कबीलों को काबू में करने के लिए दबाव डाला जा रहा है जिनसे कभी अंग्रेज हुकूमत तक हार मान बैठी थी। और यह न होने पर असन्तुष्ट अमेरिका ड्रोन मिसाइल दागकर तबाही मचा रहा है। अमेरिका बार-बार यही कह रहा है की भारत से समझोता करो, बातचीत करो व आतंकवादी नहीं भेजो वगैरह। पाकिस्तान उन सारे पश्चिमी देशों से नाराज है जो पैसे देने के साथ कई नसीहत देते रहते हैं और पैसे का हिसाब मांगते रहते हैं।

ये सारे मुल्क यह तो मानते हैं कि पाकिस्तान आतंकवाद का शिकार है, मगर फिर भी यह सलाह देते हैं कि आतंकवाद व आतंकवादियों को पैदा मत करो, इनको शह मत दो तथा इनको बलूचिस्तान और वजीरिस्तान में पनपने मत दो।

पर फिलहाल पाकिस्तान सबसे ज्यादा गुस्सा है अंग्रेजों के प्रति। भारत यात्रा के दौरान इंग्लैंड के प्रधानमंत्री डेविड कैमरॉन ने यह कह दिया कि पाकिस्तान आतंकवाद का निर्यात कर रहा है। पाकिस्तान के ब्रिटेन स्थित उच्चयुक्त वाजि़द शमसुल हसन ने कैमरॉन को नौसिखिया बताया और उनके बयान को बचकाना कहा। इसके बाद आईएसआई के प्रमुख जनरल शुजापाशा की लंदन यात्रा को रद्द कर दिया गया मगर राष्ट्रपति आसिफ अली ज़रदारी की यूरोप यात्र जारी रही और सारी जिम्मेदारी उन पर डाली गयी है कि कैमरॉन जो भारत के गणतंत्र से कुछ ज्यादा ही प्रभावित हो गये उनको याद दिलाया जाये कि पाकिस्तान में भी एक गणतांत्रिक सरकार है और उन्हें उसका समर्थन करना चाहिए था।

हकीकत में कैमरॉन ने कोई नई बात नहीं कही बल्कि कुछ दिन पहले अमेरिकी विदेश मंत्री हिलेरी क्लिंटन ने तो इस्लामाद में यह कह दिया था कि पाकिस्तान को पूरा पता है कि ओसामा बिन लादेन और तालिबान के सर्वेसर्वा मोहम्मद उमर पाकिस्तान में कहां छुपे हुए हैं, मतलब कहां छुपाए गए हैं यह इस्लामाबाद को पता है।
कैमरॉन ने अपने अल्फाज़ वापस लेने से साफ इनकार कर दिया है, बल्कि कहा है कि अगर कोई बात कहनी है तो साफ-साफ कहनी चाहिये। पाकिस्तान ने कैमरॉन प्रकरण को एक तरह की चपत समझ। इसके जवाब में और भारत के विदेश मंत्री कृष्णा और हिलेरी की पाकिस्तान यात्र के तुरन्त बाद सेना प्रमुख कियानी को तीन साल का एक्सटेंशन दे दिया गया। अब यह पहला अवसर है जब पाकिस्तान में एक नागरिक सरकार ने सेनाध्यक्ष के कार्यकाल की सीमा बढ़ाई है। इससे गणतंत्र का ढकोसला भी बना रहा, पैसे देने वाले मुल्क भी सन्तुष्ट रहे और सेना भी खुश। लेकिन जब पाकिस्तानी फौज तालिबान के असर वाले कबीलों से जूझ रही है, उस समय क्या कयानी को रिटायर होने दिया जा सकता था। जबकि कयानी स्वयं अमेरिका के साथ हुए सामरिक संवाद में बढ़-चढ़ कर हिस्सा ले रहे हैं? जब वह केवल सेनाध्यक्ष होने के बावजूद अफगानिस्तान के राष्ट्रपति से यह तकाजा़ करते हैं कि भारत को अफगानिस्तान के बाहर खदेड़ें, उनके दूतावास और कांसुलेट बंद कर दें तो मैं तालिबान के साथ समझोता करवा सकता हूँ। कयानी का कार्यकाल बढ़ाने के पीछे एक और वज़ह है पूर्व राष्ट्रपति परवेज़ मुशर्रफ  की वापसी के आसार। वे लंदन से एक नई पार्टी के नेता बनकर राजनीति में लौटना चाहते हैं, बेशक  शेरवानी पहनकर। उनको वश में करने के लिए कयानी का होना बहुत ज़रूरी समझ गया है। मतलब वर्चस्व फौज का बना रहे चाहे वर्दी में हो या शेरवानी में।

चेन स्मोकर कयानी की सबसे बड़ी खूबी है, उनका भारत विरोधी होना। पाकिस्तान के सभी पंजाबी फौजी भारत विरोधी रहे हैं। जरदारी सिंधी हैं और प्रधानमंत्री जि़लानी मुलतानी। पंजाबी कयानी वह समझोता कभी नहीं करेंगे जो मोहाजिर मुशर्रफ ने मनमोहन सिंह के साथ किया जिससे कश्मीर घाटी में करीब पांच साल शांति रही। बसें आती-जाती रहीं और लोग बातचीत और व्यापार करने लगे थे।

यह सब कुछ हो जाये फिर पाकिस्तानी फौज क्या करेगी? और भारत-पाकिस्तान के बीच विश्वास की भावना बढ़े तो पाकिस्तान की हस्ती ही खतरे में पड़ सकती है क्योंकि पाकिस्तान का निर्माण ही भारत और भारतीयों से अविश्वास की भावना से हुआ। कयानी का उदय इन सबको रोकने के लिए आवश्यक है। पर क्यानी का यही उदय भारत के लिये भले ही चिंता की बात हो मगर अमेरिका की अफ-पाक नीति को यही कयानी फिलहाल सबसे भरोसे के आदमी लग रहे हैं।

अमेरिका और नाटो के सदस्य देशों के लिये पाकिस्तान उनकी आगे की योजना के लिए बहुत जरूरी है। अमेरिका और नाटो देश अफगानिस्तान की लड़ाई से थक चुके हैं। इन देशों में जनमत लगातार अफगानिस्तान में फौज की तैनाती के खिलाफ होता जा रहा है। इसी साल इन देशों के 446 सैनिक वहां मारे जा चुके हैं। इन मुल्कों को समझ में आ गया है कि अब उनकी अफगानिस्तान में दाल नहीं गल रही है। ढेर सारी फौज और हथियार भेजने के बावजूद वे तालिबान को हरा नहीं पा रहे। अब पाकिस्तान ही केवल एक रास्ता है जिसके सहारे वे इससे पल्ला झड़ सकते हैं। पाकिस्तान इससे वाकिफ है और मौके का पूरा-पूरा फायदा उठाना चाहता है। आखिर पाकिस्तान की भारत विरोधी लड़ाई में अफगानिस्तान ही है जो उसे एक तरह की सामरिक बढ़त दे सकता है। उसके लिए काबुल में एक इस्लामाबादपरस्त सरकार होना ज़रूरी है। यह बात कयानी खुलेआम कर रहे हैं।

कयानी का बने रहना प्रधानमंत्री जिलानी के लिए भी अपने पद पर बने रहने की गारंटी है क्योंकि वे जरदारी को ज्यादा पसंद नहीं करते। इसीलिए अटकलें लगती रहती हैं कि जरदारी राष्ट्रपति पद से कभी भी हटाए जा सकते हैं। एक वजह यह भी है कि जरदारी अक्सर भारत से समझोते और दोस्ती की बात करते हैं। उन्हीं ने यह हिमायत की थी कि पाकिस्तान की फौज भारत की सीमा से हटाकर अफगान सीमा पर तैनात की जाए- कयानी ने इस बात से साफ इनकार कर दिया था। अब एक तरफ पाकिस्तान के भीतर कयानी और उनके समर्थक हैं जो किसी तरह अपने खेमे के तालिबान को काबुल की सत्ता पर चाहते हैं और दूसरी तरफ वह पूरी दुनिया है जो किसी भी तरह से अफगानिस्तान में तालिबान की वापसी नहीं चाहती। इनमें जीत किसकी होगी यह अभी नहीं कहा जा सकता।
लेखक वरिष्ठ पत्रकार हैं

  • Hindi Newsसे जुडी अन्य ख़बरों की जानकारी के लिए हमें पर ज्वाइन करें और पर फॉलो करें
  • Web Title:पाकिस्तान को गुस्सा क्यों आता है