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अंग्रेजी लेखन में शब्दों के नए मैनेजर

पिछले दस साल में हिंदी में कितने नए युवा लेखकों को प्रकाशकों ने छापा? कितने युवा कथाकारों, उपन्यासकारों की कृतियां 5000 से ज्यादा प्रति बिकीं? एक तरफ हिंदी में बड़े ही गिने-चुने नाम आएंगे जिनकी किताबें साल भर में 5000 से अधिक बिकी हों। दूसरी ओर अंग्रेजी में हमारे युवा लेखकों को न केवल पैसे, प्रसिद्धि बल्कि एक अलग पहचान जैसे सारे सुख मिल रहे हैं।

ये न तो वे युवा हैं जो किसी साहित्य के घराने से ताल्लुक रखते हैं और न ही जिन्होंने कभी पढ़ाई के दौरान लिटरेचर को बहुत चाव से पढ़ा होगा, लेकिन आज वे अंग्रेजी लेखन में एक जाना माना नाम बना चुके हैं। चेतन भगत को लेखन की दुनिया में आए मुश्किल से 10 साल ही हुए हैं, लेकिन लेखन की बदौलत ही आज उसके पास पैसे, प्रतिष्ठा, पाठक वर्ग और प्रकाशक सब कुछ हैं। चेतन की ही तरह करन बजाज या फिर मंडर कोकटे, इन्हें मालूम था कि नौकरी में रहते हुए लेखन के बल पर ही पैसे कमाए जा सकते हैं। और उसके बाद उन्होंने जो किया उस पर हिंदी और देश की सभी क्षेत्रीय भाषाओं के लोगों को सोचना चाहिए।

आमतौर पर हमारी भाषाओं में युवा लेखक की उम्र 20 से लेकर 50-55 बरस तक होती है। बेशक उनकी कितनी ही किताबें बाजार में हों, लेकिन उनकी पहचान युवा लेखक की ही रहती है। वहीं अग्रेजी में कुछ अलग फिज़ा है। वहां 24 साल का अनाम लेखक भी किताब की बिक्री के आधार पर अपनी पहचान बना लेता है। पिछले दस साल में जिस प्रकार से अंग्रेजी में लेखक सामने आए हैं, उसे देख कर पाठकों की कमी का अपनी भाषा का रुदन एक पहेली ही लगता है। दरअसल हिंदी में लेखक पहले लिखना शुरू करते हैं फिर बाजार और प्रकाशक को ढूंढ़ते हैं। जबकि अंग्रेजी में लेखक पहले पाठक वर्ग को ध्यान में रखते हैं फिर विषय का चुनाव करते हैं। कैसा लेखन युवाओं को भाएगा उसकी पहचान कर फिर कलम उठाते हैं। लेकिन हिंदी में जरा स्थिति उलट है पहले हम अपने मन की लिखते हैं। वही लिखते हैं जिसे पूर्व के लेखकों ने लिखा है। कईं बार नया लेखक पूर्व के कथानक को नए संदभरें में रच डालता है। उसे इस बात से कोई खास लेना नहीं होता कि इसको पढ़ने वाले पसंद भी करेंगे या नहीं। प्रकाशक कभी भी घाटे का सौदा आखिर क्यों करें। पैसे फंसाना कोई नहीं चाहता। वह देखता है कि फलां लेखक की किताब पिछले साल कितनी बिकी थी। उसकी नई पांडुलिपि पर जुआ खेला जा सकता है। इसलिए चेतन भगत, किरण वाजपेई व अन्य अंग्रेजी लेखकों को बड़ी और छोटी प्रकाशन कंपनियां छापने से गुरेज नहीं करतीं।

अंग्रेजी के इस नए लेखन के प्लाट अमूमन कॉलेज के प्रांगण में पलने, बनने, टूटने वाले प्रेम के इर्द-गिर्द घूमते हैं। निर्मल वर्मा ने एक बातचीत में कहा था कि लेखक को विषय का चुनाव बड़ी ही सावधानी से करना चाहिए। विषय कोई भी धांसू या फिसड्डी नहीं होते। बल्कि यह लेखक पर निर्भर करता है कि उसने जिस विषय को चुना है, उसके साथ पूरी ईमानदारी बरती या नहीं। निर्मल वर्मा की कही बात एक ऐसा सच है जो सर्वकालिक है। किसी भी लेखक के लिए जरूरी है कि उसके लेखन और उसकी भाषा में आज के दौर का समाज प्रतिबिंबित हो। लेखन और पाठक के बीच रिश्ता तभी बनता है जब पाठक लेखन से जुड़ाव महसूस करता है। अंग्रेजी के लेखक इस समीकरण को ज्यादा अच्छी तरह समझ रहे हैं। उन्हें पता है कि कौन से पाठक उनकी किताब खरीदेंगे। इसलिए वे ऐसे विषय और ऐसी भाषा का चुनाव करते हैं जिससे वह वर्ग अपने को जुड़ा हुआ पाता है। निश्चित रूप से यह पॉपुलर लेखन है और उसकी अपनी सीमाएं हैं। साहित्य की साधना करने वालों को हो सकता है, यह रास्ता अच्छा न लगे। लेकिन जो पाठकों की कमी की बात करते हैं और पैसे का रोना रोते हैं उन्हें अंतत: इसी रास्ते पर ही आना होगा।

यह बात सिर्फ युवा लेखकों के लिए ही नहीं है बल्कि उन स्थापित लेखकों के लिए भी है, जो साहित्यिक शुद्धता के नाम पर बहुत सी नई चीजों को सिरे से ही नकार देते हैं। हमारी दिक्कत यह भी है कि हमारी भाषाओं में या तो लुगदी साहित्य लिखने वाले लोग हैं या ‘उच्च-कोटि’ की साहित्य साधना करने वाले लोग। अच्छे पॉपुलर साहित्य के ऐसे पुल बहुत कम हैं, जो पाठकों के एक हिस्से को परिपक्व बनाते हुए अच्छे साहित्य तक ले जाएं। ये पुल बनाने भी जरूरी हैं।

लेखक स्वतंत्र पत्रकार हैं

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