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बड़े लोगों की महंगाई

हम जैसे फटीचर मध्यमवर्गीय लोग महंगाई का रोना रो रहे हैं लेकिन राष्ट्रमंडल खेलों के आयोजकों को जितनी महंगी चीजें मिल रही हैं, उसकी लिस्ट देखी तो शर्म से पानी-पानी हो गया। उन्हें एक-एक छाता, बड़ा वाला छाता जो होटलों, समुद्र किनारों वगैरा पर दिखता है, वह तकरीबन 6500 रुपए का पड़ा, वह भी खरीद कर नहीं, सिर्फ कुछ दिनों के लिए किराए पर। एक कुर्सी का किराया 8000 रुपए के ऊपर। टॉयलेट पेपर का रोल 4000 रुपए का, गनीमत है यह शायद किराए पर नहीं लिया गया। और सोप डिस्पेंसर, जिससे बाथरूम में लिक्विड सोप निकलता है, वह एक-एक दस हजार रुपए का। इतने महंगे डिस्पेंसर में दस रुपए का साबुन तो नहीं डलेगा। इसलिए साबुन की कीमत कुछेक लाख से क्या कम होगी।

इसके बाद आप 250 रुपए की कुर्सी खरीद लाते हैं, टॉयलेट पेपर तो आप खैर क्या खरीदेंगे, पर दस रुपए का साबुन खरीदते हुए सोचते हैं कि कितनी महंगाई हो गई। देखिए उन महान लोगों को जो देश और खेल की खातिर इतनी महंगी चीजें खरीदते हैं और उफ तक नहीं करते। और ऊपर से आप अगर बाजार से चालीस रुपए किलो की सब्जी खरीदते हैं तो आप पर भ्रष्टाचार का इल्जाम नहीं लगता, सीबीआई आपकी जांच करने नहीं पहुंचती। इन बेचारों को तो देश की खातिर इतना त्याग करने के बावजूद भ्रष्टाचार के आरोप सहने पड़ते हैं।

राष्ट्रमंडल खेलों में विदेशों से मेहमान आएंगे उन्हें क्या हजार-दो हजार की छतरी के नीचे बिठाया जाएगा या दस रुपए का साबुन हाथ धोने के लिए दिया जाएगा। वे अपने देश जाकर जब यह बताएंगे तो क्या हमारे देश का नाम ऊंचा नहीं होगा। इसके लिए भ्रष्टाचार के चंद आरोप सहने पड़ें तो ये महान लोग देश की खातिर इतना त्याग करने के लिए कभी भी तैयार हैं।

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