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बयान का रहस्य

संयुक्त राष्ट्र महासचिव बान की मून के कश्मीर मसले पर कथित बयान को लेकर भारत का विरोध स्वाभाविक है क्योंकि यह बयान न केवल अंतरराष्ट्रीय राजनय की शैली के अनुरूप नहीं है, बल्कि कश्मीर में जो स्थिति अभी है, उसे बेहतर बनाने की बजाय बदतर ही बनाएगा। संयुक्त राष्ट्र महासचिव एक अनुभवी राजनयिक हैं और उनसे ऐसी उम्मीद नहीं थी। इस बयान में कश्मीर को ‘भारत शासित कश्मीर’ कहा गया था जो कि आमतौर पर पाकिस्तानी शब्दावली है और भारत और पाकिस्तान को इस मसले पर मिल-बैठकर बात करने का सुझाव था। जाहिर था कि भारत सरकार इस पर विरोध प्रकट करती और संयुक्त राष्ट्र में भारत के स्थायी प्रतिनिधि ने संयुक्त राष्ट्र महासचिव से मिलकर यह विरोध दर्ज किया। महासचिव ने बयान पर माफी मांगी लेकिन अजीब बात यह है कि यह बताया गया कि महासचिव के प्रवक्ता से कश्मीर मुद्दे पर कोई बयान न देने को कहा गया था और कथित बयान संयुक्त राष्ट्र संघ के आंतरिक दिशा-निर्देशों का हिस्सा था जिसे प्रवक्ता ने मीडिया को मेल कर दिया।

संयुक्त राष्ट्र संघ और उसके महासचिव की गरिमा का सम्मान करते हुए भारत को उनकी माफी और स्पष्टीकरण को स्वीकार करना ही चाहिए लेकिन यह सवाल भी उठता है कि महासचिव का कोई प्रवक्ता इस तरह का गैर-जिम्मेदाराना बयान कैसे कर सकता है, जिससे कि राजनयिक संकट खड़ा हो जाए। यह मामला इसलिए भी पेचीदा हो जाता है कि जिस प्रवक्ता ने यह बयान मीडिया को दिया है, वह पाकिस्तानी मूल का राजनयिक है। इसीलिए यहां सवाल यह भी है कि यह बयान एक ऐसे देश के राजनयिक से क्यों दिलवाया गया जो मसले में एक पार्टी है।

इस तरह की घटना संयुक्त राष्ट्र के प्रति अविश्वास पैदा कर सकती है जो कि ठीक नहीं है। संयुक्त राष्ट्र के कामकाज से कई देशों को शिकायत हो सकती है, लेकिन उसकी जरूरत और महत्व से कोई इनकार नहीं कर सकता। मगर जरूरत है तो उसकी भूमिका को बेहतर बनाने की। बड़े और ताकतवर देशों के मुकाबले छोटे देशों को संयुक्त राष्ट्र का काफी सहारा होता है, चाहे वह विदेशी मामलों में हो या मानवीय पक्ष से मदद में। अगर कोई प्रवक्ता संयुक्त राष्ट्र में रहते हुए अपने संकीर्ण राष्ट्रीय हितों के लिए संयुक्त राष्ट्र महासचिव को असुविधाजनक स्थिति में डालता है, तो यह ठीक नहीं है। कश्मीर की स्थिति इस वक्त नाजुक है और मुश्किलें पैदा करने वाले लोग तमाम मुश्किलें पैदा कर रहे हैं। ऐसे में संयुक्त राष्ट्र की भूमिका मुश्किलें बढ़ाने वाली नहीं होनी चाहिएं।

संभव है महासचिव के दफ्तर से सचमुच गलती हो गई हो, उसके पीछे किसी का कोई इरादा न हो, फिर भी इस बात की जांच की जानी चाहिए। महासचिव को ऐसे बयान के लिए माफी मांगनी पड़े जो उन्होंने दिया ही नहीं, यह एक गंभीर मसला है और यह कभी दोहराया न जाए, यही अच्छा है। भारत बहुत शुरुआत से संयुक्त राष्ट्र संघ बनाने और उसे मजबूत करने का पक्षधर रहा है, आजादी के पहले से हमारे नेता इस संस्था के समर्थक रहे हैं, इसलिए हमें इसके दुरुपयोग पर चिंता होना सहज है। यह उम्मीद की जानी चाहिए कि एक निष्पक्ष अंतरराष्ट्रीय संस्था की तरह संयुक्त राष्ट्र की विश्वसनीयता बनी रहेगी और इसके लिए सबको कोशिश करनी चाहिए।

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