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जनता की गाढ़ी कमाई और देश की प्रतिष्ठा

राष्ट्रमंडल खेलों से जुड़े आयोजन स्थलों व अन्य स्थानों के निर्माण में जिस प्रकार लगातार भ्रष्टाचार की खबरें आ रही हैं, निश्चित ही इससे दुनिया में हमारी साख को धक्का लगा है। खेल शुरू होने के दो महीने पहले तक ज्यादातर स्थल न सिर्फ अधूरे पड़े हैं, बल्कि हड़बड़ी में उनका उद्घाटन भी किया जा रहा है, जो गड़बड़ी की ओर इशारा करता है। निर्माण स्थलों की गुणवत्ता को लेकर अनाप-शनाप व्यय पर जिस प्रकार अंगुलियां उठ रही हैं, इससे आम लोगों को महसूस होने लगा है कि जनता की गाढ़ी कमाई को विकास और खेलों के नाम पर पानी की तरह बहाया जा रहा है।

सरकारी तंत्र की समस्या यही है कि फजीहत के बावजूद कोई भी कार्य समयबद्ध नहीं होता नजर आ रहा है, क्योंकि भ्रष्टाचार और काहिली प्रशासन तंत्र का अंग बन चुके हैं। इस वजह से वक्त पर परियोजनाएं तैयार नहीं हो पातीं। राष्ट्रमंडल खेलों के आयोजन से न सिर्फ दिल्ली बल्कि भारत की प्रतिष्ठा भी दांव पर है।
ओमप्रकाश प्रजापति, ई-4, नन्दनगरी, दिल्ली


घाटी में नर्क
कश्मीर घाटी आज जन्नत की जगह नरक बन गई है बस नाम ही स्वर्ग रह गया है। अलगाववाद की आग में लोग अपनी जान गंवा रहे हैं और इस आग में जो घी गिर रहा है, वह पड़ोसी देश का है। ऐसे में सिर्फ सेना ही घाटी के हालात पर काबू पा सकती है जो कि देश की सुरक्षा के लिये बहुत जरूरी है। इतना कुछ हो जाने के बाद भी कठोर कदम न उठाना और सभी दलों का एकजुट न होना वोटों की राजनीति की देन है अन्यथा अब तक इतना कुछ न होता और हालात काबू कर लिए जाते।
अंकुर त्यागी

गंदगी का ढेर
दादा देव मंदिर पालम एरिया का एक प्रसिद्ध मंदिर है। इस मंदिर की तरफ सिद्धार्थ कुंज सोसाइटी और नेशनल मलेरिया रिसर्च इंस्टीटय़ूट से जो सड़क जाती है, उस पर जमा कूड़ा-कचरा आसपास के वातावरण को दूषित ही नहीं कर रहा है, अपितु यहां आने वाले भक्तजनों को भी पीड़ा पहुंचाता है। यह स्थान दादा देव मार्केट की शोभा पर भी एक बदनुमा धब्बा है। संबंधित अधिकारियों से निवेदन है कि वे तत्काल दादा देव मंदिर की तरफ जाने वाली इस सड़क की सफाई व्यवस्था पर उचित ध्यान देने की कृपा करें ताकि मंदिर में आने वाले भक्तों और मार्केट में पधारने वाले लोगों को अपनी नाक को बंद करने की जहमत न उठानी पड़े।
सुभाष लखेड़ा, सिद्धार्थ कुंज, द्वारका, नई दिल्ली

शिक्षा का अधिकार
सरकार ने शिक्षा के ऊपर जितना ध्यान दिया है, वह तो ठीक है किन्तु अभी भी काम पूरा नहीं हुआ है। अभी भी शिक्षा के मामले में हम बहुत पिछड़े हुए हैं। सरकार ने शिक्षा के अधिकार को लागू तो कर दिया है, परन्तु यह अधिकार सबको नहीं मिल पा रहा है। बहुत सारे बच्चे जो गरीब तबके से आते हैं, अभी भी इस अधिकार से वंचित हैं। प्राइवेट स्कूलों में मनमानी तो है ही, सरकारी स्कूलों में भी नामांकन करवाने में अभिभावक के पसीने छूट जाते हैं। स्कूल प्रबंधक नामांकन के नाम पर अभिभावक को बहुत तंग करते हैं। कभी कोई पेपर कम है तो कभी कोई पेपर, ऐसा बताकर कई-कई दिन चक्कर कटवाते हैं और दिहाड़ी पर काम करने वाला मजदूर इतना मायूस हो जाता है कि उसे यह शिक्षा जैसे शब्द बेमानी लगने लगते हैं। सरकार को चाहिए कि सिर्फ शिक्षा का अधिकार ही काफी नहीं है, इसके लिए नामांकन का अधिकार भी जरूरी करना चाहिए। आज दिल्ली में जितने स्कूल चल रहे हैं, उनमें से कई स्कूल ऐसे हैं जिनकी पढ़ाई टैंट में होती है । सरकारी स्कूलों में छात्रों के लिए पीने का पानी नहीं है, शौचालयों की व्यवस्था ढंग की नहीं है। किसी छात्र की अगर तबियत खराब हो जाये तो स्कूल प्रशासन उन्हें उनके घर भिजवा देता है। उनके पास प्राथमिक चिकित्सा तक की व्यवस्था नहीं है जबकि इन सबके लिए सालाना फंड की सुविधा इन स्कूलों को मिलती है। सरकार सिर्फ शिक्षा का अधिकार कार्यक्रम लागू करके अपने दायित्वों से नहीं बच सकती। यह एक मौलिक अधिकार है। ऐसे अधिकारों को कार्यान्वित करने के लिए मजबूत इच्छा शक्ति की जरूरत है।
धर्मेन्द्र कुमार, नंगली डेरी, नजफगढ़,नई दिल्ली

हाय महंगाई
देश में महंगाई से हाहाकार मचा हुआ है। आम आदमी को रोजमर्रा की खाने-पीने की चीजें भी खरीदना मुश्किल हो रहा है। दूसरी तरफ हालात यह हैं कि आज देश में लाखों टन गेहूं, चावल और दालें सरकारी लापरवाही के कारण देश के अलग-अलग भागों में खुले मैदानों में सड़ रही हैं। इस सबका कारण सरकारी विभागों में बहुत ज्यादा कामचोरी और भ्रष्टाचार का बढ़ना है। पद पर बैठते ही सरकारी नुमाइंदे और राजनेता कर्तव्यविहीन होकर देश की गरीब जनता का पैसा दोनों हाथों से लूटने लग जाते हैं। ऐसे में देश में महंगाई का कम होना बहुत ही  मुश्किल है।
हरिकृष्ण बहुगुणा, सी 6/1, प्रताप विहार,नई दिल्ली

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