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झूठी शान के लिए हत्या मामले में तीन को उम्रकैद

झूठी शान के लिए हत्या मामले में तीन को उम्रकैद

सुप्रीम कोर्ट ने झूठी शान के लिए हत्या मामले में तीन लोगों को उम्रकैद की सजा सुनाते हुए कहा कि ऐसे मामलों के अभियुक्तों को मौत की सजा दी जानी चाहिए। उच्चतम न्यायालय ने हालांकि मास्टर कृष्णा, राम सेवक और किशोरी को मौत की सजा नहीं सुनाई क्योंकि यह मामला दो दशक पुराना था।

न्यायालय ने एक बच्चे तथा एक अन्य गवाह की गवाही को खारिज कर आरोपियों को बरी किए जाने को लेकर उच्च न्यायालय को भी फटकार लगाई। न्यायमूर्ति एचएस बेदी और न्यायमूर्ति जेएम पांचाल की एक पीठ ने अपने फैसले में कहा कि छह लोगों की हत्या कर लगभग पूरे परिवार की झूठी शान के आधार पर हत्या कर दिए जाने के मामले में इस बात में कोई संदेह नहीं होना चाहिए कि यह विरलतम मामला है और इसलिए मुकदमे की सुनवाई करने वाली अदालत का मौत की सजा सुनाने का फैसला पूरी तरह उपयुक्त था।

पीठ ने कहा कि हालांकि यह अदालत इस बात पर भी गौर करती है कि इस वारदात को बीते लगभग 20 साल हो चुके हैं। वारदात 10-11 अगस्त 1991 को हुई थी। इसके अलावा, उच्च न्यायालय ने अभियोगियों को 12 अप्रैल, 2002 को एक फैसले के तहत बरी कर दिया था। 12 अप्रैल, 2002 के बाद आज तक इस अदालत के सामने अभियोगियों के खिलाफ कोई नकारात्मक बात नहीं आई है।

सुप्रीम कोर्ट ने कहा कि 2002 में बरी कर दिए जाने के बाद तीनों लोगों को मौत की सजा देना मामले के तथ्यों और परिस्थितियों के आधार पर उपयुक्त नहीं होगा इसलिए उन्हें उम्र कैद की सजा दी जाती है। गुलजारी परिवार के छह सदस्यों, उनकी पत्नी रामवती, भाई बाबूराम और दंपती के तीन पुत्रों, राजेश, उमेश और धर्मेन्द्र की कृष्णा और दो अन्य लोगों ने मध्य प्रदेश के फर्रखाबाद जिले में गोली मार कर हत्या कर दी थी। गुलजारी का पुत्र, जो उस समय मात्र छह वर्ष का ही था, इस हत्या का गवाह था। इसके अलावा, इस मामले में एक पड़ोसी झब्बूलाल भी गवाह था।

यह हत्याएं कृष्णा की पुत्री सोनतारा के झब्बूलाल के पुत्र अमर सिंह के साथ भाग जाने के चलते की पष्ठभूमि में की गई थी। तीनों ने गुलजारी के परिवार की हत्या कर दी क्योंकि उन्हें शक था कि रामवती ने उनके भागने में मदद की थी। हालांकि सत्र न्यायालय ने उन्हें मौत की सजा सुनाई थी लेकिन इलाहाबाद उच्च न्यायालय ने गवाहों के बयानों पर अविश्वास जताते हुए बरी कर दिया था जिसके बाद उत्तर प्रदेश सरकार ने उच्चतम न्यायालय में अपील की थी।

 

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