अगली स्टोरी

class="fa fa-bell">ब्रेकिंग:

कश्मीरी पत्थर-युद्ध के सबक

पिछले पाँच साल से कश्मीर में गर्मी का मौसम आंदोलनों की तपिश लेकर आता रहा है। इस बार माहौल चिंताजनक है। 17 वर्षीय किशोर तुफैल अहमद मट्टू की 11 जून को हुई मौत के बाद शुरू हुई हिंसा थमकर नहीं दे रही है। कभी इस वजह से और कभी उस वजह से इसे हवा मिल रही है। पाकिस्तान पर लगातार दबाव के बाद आतंकवादियों पर लगाम ज़रूर लगी है। पर कश्मीरी जनता के साथ मिलकर उसे मुख्यधारा में लाने की कोशिश नहीं हुई।

मुंबई हमले के बाद पाकिस्तान पर बने दबाव और 2008 के चुनाव में 61 प्रतिशत वोट पड़ने के बाद हमने मान लिया कि कश्मीर अब कोई समस्या नहीं है। 2008, फिर 2009 और फिर इस साल लगातार चल रहे आंदोलनों की अब और उपेक्षा हुई तो परिणाम गम्भीर होंगे।

पिछले महीने विदेशमंत्री की पाक यात्रा के बाद खराब हुए माहौल से कश्मीर में अलगाववादियों का उत्साह बढ़ा है। 2002 में हुर्रियत के दोफाड़ हो जाने के बाद से सैयद अली शाह गिलानी अपनी तहरीक-ए-हुर्रियत के साथ अलग-थलग पड़ गए थे।

मीर वाइज़ उमर फारूक की हुर्रियत के साथ संवाद बढ़ा था। 2006 में कश्मीरी पार्टियों के राउंड टेबल मे हुर्रियत नहीं आई, पर लगता था कि देर-सबेर वह दिल्ली सरकार के साथ बातचीत में शामिल हो जाएगी। पर इस बीच मुख्यधारा की कश्मीरी पार्टियों की गैर-जिम्मेदारी और दिल्ली सरकार के दूसरे मसलों में फंस जाने से कश्मीर हमारे एजेंडे में पीछे चला गया। प्रधानमंत्री का रविवार की रात कैबिनेट कमेटी ऑन सिक्योरिटी की बैठक को बुलाना और इसके अगले रोज़ मुख्यमंत्री उमर अब्दुल्ला का दिल्ली आना बताता है कि कहीं कुछ सीरियस है। 

दिल्ली में उमर अब्दुल्ला ने दो बातें कहीं, जिन पर ध्यान देने की ज़रूरत है। एक तो यह कि अपने ऊपर संयम रखने की जिम्मेदारी एकतरफा नहीं होती। साथ ही यह भी कहा कि कश्मीर एक राजनैतिक प्रश्न है। जब तक इसका समाधान नहीं होता, ऐसा होता रहेगा।

जहां तक पहली बात का सवाल है, जो लोग हालात का फायदा उठाना चाहते हैं, वे संयम क्यों रखना चाहेंगे? वे तो उत्पात ही चाहेंगे। या ऐसे हालात चाहेंगे, जिनमें उत्पात हो। स्थिति यह है कि सैयद अली शाह गिलानी की तहरीक-ए-हुर्रियत दूसरी हुर्रियत पर हावी हो गई है। आसिया अंदराबी की दुख्तराने मिल्लत की बोली काफी समय बाद फूटी है। किसने उन्हें इतना आगे आने का मौका दिया?

यह राजनैतिक मसला है तो किसने इसके राजनैतिक समाधान को रोका है? उमर अब्दुल्ला अब अपने मंत्रियों को प्रदेश के अलग-अलग इलाकों में भेज रहे हैं ताकि जनता से संवाद हो सके। नेशनल कांफ्रेंस की प्रतिद्वंद्वी पीपुल्स डेमोक्रेटिक पार्टी सर्वदलीय बैठक तक में नहीं आती। जब राजनीति की यह दशा है तब कौन इस समस्या का समाधान खोजेगा? सभी लोग अपने छोटे हितों को देख रहे हैं।

कश्मीर का व्यापक हित किसी को नज़र नहीं आ रहा है। प्रदेश का विकास और सरकार में जनता में भागीदारी की फिक्र किसी को नहीं है। पूरे देश में पंचायती राज है कश्मीर में नहीं। विधान सभा चुनाव में जनता की इतनी अच्छी भागीदारी के बाद पंचायती व्यवस्था को मौका मिलता तो शायद बेहतर परिणाम आते।

बताते हैं कि इस बार के आंदोलन में नई पीढ़ी आगे है। कश्मीर के नौजवान इसे लीड कर रहे हैं। प्रत्यक्ष रूप में वे गिलानी के कश्मीर छोड़ो आंदोलन को आखिरी लड़ाई मान कर चल रहे हैं। नौजवानों का आंदोलन में आना बताता है कि शिक्षा या रोज़गार के मोर्चे पर कहीं कमी है। उनकी कुंठा का फायदा गिलानी साहब उठा रहे हैं। मई के महीने में हम शाह फैज़ल के आईएएस परीक्षा में टॉप करने पर मुग्ध थे। शाह फैज़ल या काज़ी तौक़ीर को रोल मॉडल हम नहीं बना पाए, बल्कि जून के महीने में तुफैल अहमद मट्टू की मौत हमारे नाम आई।

कश्मीरी आंदोलन और नक्सली आंदोलन में हालांकि समानता नहीं, पर मुख्यधारा की राजनीति दोनों जगह फेल है। जनता की कुंठा का फायदा उठाने वाले तत्व तो आगे आएंगे ही। बेशक हमारी फौज ने आतंकवादियों पर काबू पा लिया, पर जनता से जोड़ने का काम राजनीति का है। राजनीति सिर्फ सत्ता का सुख भोगने के लिए नहीं है। सन् 2006 में प्रधानमंत्री के साथ राउंड टेबल में पाँच कार्यदल बनाने की घोषणा हुई थी। कहाँ हैं वे कार्यदल? क्या कार्य कर रहे हैं?

लगता है हम मसलों को टालने के लिए राजनीति का इस्तेमाल करते हैं। समाधान के लिए नहीं। इसमें कश्मीर की राजनीति और केन्द्र की मुख्यधारा की राजनीति दोनों जिम्मेदार हैं। भारत और पाकिस्तान की बातचीत का चलते रहना भी कश्मीर में माहौल को बेहतर बनाता है। मुम्बई कांड के बाद आतंकवाद के खिलाफ हमारी मुहिम स्वाभाविक है, पर उतने भर से काम पूरा नहीं होता। अभी तक यह स्पष्ट नहीं है कि विदेश मंत्री की पाकिस्तान यात्रा के ठीक पहले डेविड हेडली से सम्बद्ध गृह सचिव का बयान क्यों आया।

इसके पहले गृहमंत्री पी. चिदम्बरम हेडली के बयानों के बाबत जानकारी पाकिस्तान को दे चुके थे। यों भी अमेरिका को भारत ने आश्वासन दिया था कि इस मामले में हो रही जाँच को गोपनीय रखा जाएगा। अमेरिकी विदेश विभाग के प्रवक्ता ने जब इस बात को कहा तो उसका एक संकेत हमारे यहाँ से हुई गलती को रेखांकित करना भी था। पाकिस्तान के विदेशमंत्री के बेतुके व्यवहार की आलोचना करने मात्र से काम पूरा नहीं होता। बात इतनी है कि इन मामलों की संवेदनशीलता को समझना चाहिए।

कश्मीर में इन दिनों जो पत्थर युद्ध चल रहा है, वह फिलस्तीन की ग़ाज़ा पट्टी में चल रहे इंतफादा की नकल है। इसमें शामिल लोग ज्यादा नहीं हैं, पर जैसे-जैसे आंदोलन चल रहा है, मरने वालों की संख्या बढ़ रही है। इससे आंदोलन को हवा मिलती है। वे इसे धार्मिक शक्ल दे चुके हैं। शुक्रवार को छुट्टी और रविवार को काम का कार्यक्रम चला रहे हैं। लगातार हड़ताल कराने में कामयाब हैं। स्कूल कॉलेज बंद हैं। पर यह लम्बे अर्से तक नहीं चल पाएगा।

गिलानी साहब की नेतागिरी चमक रही है, पर उनके विरोधी भी हैं। पाकिस्तान में बैठे युनाइटेड जेहाद काउंसिल के नेता सैयद सलाहुद्दीन ने इसकी आलोचना की तो आंदोलनकारियों ने उन्हें खरी-खोटी सुना दी। उमर अब्दुल्ला को इन नौजवानों से संवाद की कोशिश करनी चाहिए। ऐसा आंदोलन कई साल से चल रहा है। इस साल मुखर और प्रखर हुआ है। उनकी इंटेलीजेंस क्या कर रही थी। ये सब बातें सामान्य गवर्नेंस की हैं। कम से कम उसे तो दुरुस्त करना ही चाहिए।

लेखक वरिष्ठ पत्रकार हैं

pjoshi23@gmail.com

  • Hindi Newsसे जुडी अन्य ख़बरों की जानकारी के लिए हमें पर ज्वाइन करें और पर फॉलो करें
  • Web Title:कश्मीरी पत्थर-युद्ध के सबक