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ब्लॉवार्ता : मीडिया की मास्टरी वाया ब्लॉगरी

हिन्दी न्यूज चैनलों का आलोचना काल चल रहा है। उनके हर काम की कड़ी परीक्षा ली जा रही है। जितनी कड़ी परीक्षा ली जाती है, हिन्दी न्यूज चैनल उतने ही बिगड़े जा रहे हैं। जब से टीआरपी बलम ने चैनलों को सताना शुरू किया है, सजनी कजरी छोड़ कजरारे गाने लगी हैं। सारी कोशिश है कि आप जैसे ही रिमोट उठायें, आपकी आंखों को बदहवास कर दें ऐसा कोई विजुअल या संवाद चलता दिखे और आप एक मिनट के लिए आंखें फाड़ कर देखते रहे ताकि टीआरपी मीटर आपको रिकार्ड कर ले। एक मिनट तक आप खबरों की कैबरे देखते रहें इसलिए खबरों को हमेशा चिर यौवना बना कर रखा जा रहा है।

न्यूज चैनलों की हर खबर की खबर लेने में ब्लॉग ने धारदार भूमिका अदा की। आनंद प्रधान, विनीत कुमार, दिलीप मंडल ये कुछ नाम ऐसे हैं जो आलोचना की तटस्थ परंपरा कायम कर रहे हैं। भारतीय जनसंचार संस्थान में पढ़ाने वाले आनंद प्रधान का एक ब्लॉग है तीसरा रास्ता। आनंद अब मीडिया विशेषज्ञ की भूमिका में माध्यम का विश्लेषण कर रहे हैं। एक लेख है ‘अपराध रिपोर्टिंग का’। पहले तो आप क्लिक कीजिए http//taanabaana.blogspot.com।

आनंद लिखते हैं कि हिन्दी के अधिकांश चैनलों पर अपराध के विशेष कार्यक्रम भी दिखाए जाते हैं लेकिन अपराध की वह खबर शहरी मध्यमवर्गीय पृष्ठभूमि से हो और उसमें सामाजिक रिश्तों और भावनाओं का एक एंगल भी हो तो चैनलों की दिलचस्पी देखते ही बनती है। दिक्कत तब होती है जब एक दूसरे से होड़ करने के लिए रिपोर्टिंग के बहुत बुनियादी नियमों को अनदेखा कर दिया जाता है। चैनलों और उनके रिपोर्टरों का सारा जोर तथ्यों से अधिक कहानी गढ़ने पर लगता है।
 
आनंद हिन्दुस्तान टाइम्स का उदाहरण देते हैं। मार्च के महीने में हिन्दुस्तान टाइम्स और हिन्दुस्तान ने भूख के व्यापक साम्राज्य पर सीरीज चलाई थी। आनंद कहते हैं कि इस तरह की खबरें हिन्दी के अन्य अखबारों और चैनलों में पहली खबर क्यों नहीं बनती हैं। क्या भूख तब तक खबर नहीं है जब तक कोई मौत न हो जाए?

क्या स्थाई और नियमित भूख से तिल-तिलकर मर रहे और कुपोषण के शिकार बच्चों की खबर नहीं है? सवाल वाजिब है लेकिन पाठक की भूमिका क्या सिर्फ अखबार और केबल वाले को पैसे देने तक ही सीमित है। जब सब उसी के नाम पर हो रहा तो वो क्यों नहीं कहता है कि खराब क्यों परोसा जा रहा है। आनंद पुराने जमाने के किसी मास्टर की तरह नए जोश से सवाल उठा रहे हैं। मास्टर का यही काम भी है।

विनीत कुमार के ब्लॉग पर जरूर जाइये। विनीत टीवी के एक गंभीर दर्शक हैं। विश्व कप फुटबाल के दौरान आक्टोपस बाबा की खबरों में दिलचस्पी के लिए ग्लोबल मीडिया की आलोचना करते हैं। कहते हैं कि हमारे हिन्दी टीवी वालों को ही क्यों गरियाया जा रहा है। इंग्लिश चैनल वाले भी कम चिरकुटई नहीं करते हैं। न्यूज बिजनेस पर गौर करें तो पिछले तीन महीने में यह खबर सबसे ज्यादा सेलेबल साबित हुई है। विनीत के ब्लॉग गाहे-बगाहे पर जाने के लिए क्लिक करना होगा http//taanabaana.blogspot.com

विनीत लिखते हैं कि दसवीं तक जिस किसी ने फिजिक्स की पढ़ाई की है उन्हें पता है कि ऊर्जा का विनाश नहीं होता। टेलीविजन इसी फार्मूले पर काम करता है। इस क्रम में उसके लिए कुछ इमेज ऐसी हैं जो कभी नहीं मरेंगे। उनका स्टेटस भले ही बदल जाए लेकिन उनकी टीआरपी वैल्यू बनी रहेगी। विनीत अपनी बात शोएब और सानिया मिर्जा की शादी की कवरेज के संदर्भ में लिख रहे हैं।

विश्वास था कि न्यूज चैनल वाले महेंद्र सिंह धोनी और साक्षी की शादी में ऐसा ही करने वाले हैं। इन आलोचनाओं से इत्तफाक रखते हुए एक सवाल का जवाब नहीं मिलता। कितने दर्शकों ने इस तरह की कवरेज को गलत समझा और न्यूज चैनल न देखने का फैसला किया।

न्यूज चैनलों और सीरियलों की दुनिया पर विनीत अच्छा विमर्श पेश कर रहे हैं। अखबारों में टीवी आलोचनाओं का हाल बहुत बुरा है। गनीमत है ये ब्लॉगर समीक्षक टीवी समीक्षा को भी नया रंग दे रहे हैं। इसी कड़ी में एक और साइट है मीडिया खबर डॉट कॉम। उसका नया संस्करण लांच हो चुका है। इनका असर तो हो ही रहा है।

न्यूज रूम में संपादक या पत्रकार नजरें बचा कर एक बार तो देख ही लेता है कि भड़ास ने क्या लिखा, विनीत ने क्या लिखा, आनंद क्या कह रहे हैं और मीडिया खबर पर क्या खबर लगी है। अब तो कई लोग इनको मीडिया की खबर लीक भी कर देते हैं। मीडिया के भीतर के मंच यही हैं।

ravish@ndtv.com

लेखक का ब्लॉग है naisadak.blogspot.com

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