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चलो जेल भी हो आएं

मौलाना दाढ़ी में एक छोटी कंघी चलाते हुए आए। आदाब अर्ज के बाद बोले- ‘भाई मियां, स्मार्ट दिखने की चाह तो कौव्वे में भी होती है। पुराना जूता ज्यादा पालिश खाता है। स्मार्ट तो मेरे अब्बा थे। 75 की उम्र में भी मूंछ सवा नौ बजाती थी। अपनी तो झुक कर आठ बीस पर आ गई। हम आप दोनों गंजे सही। फिर भी किनारे-किनारे मैदान की क्यारी जैसी बालों की जो लाइन बची है उसमें कंघी मार लिया करो। बकौल शायर- बुढ़ापे में जवानी से भी ज्यादा जोश होता है, भड़कता है चिरागे सहरी जब खामोश होता है।’

मुंह के अंदर पान दूसरी जानिब ठेल कर बोले- ‘अल्ला कसम क्या-क्या गुल खिल रहे हैंगे। प्रदेश में दो दर्जन जेलों पर एक साथ छापे पड़े हैं। कहा गया है कि बकैतों ने जेल मेनुअल का उल्लंघन किया है। रहे नाम अल्ला का। मेनुअल का दामन पकड़ कर ही चलना होता तो जेल काहे को आते? बाहुबलियों का शौक है कि चलो, एक बार जेल भी हो लें। कंघा जैसे घर रहे तैसे रहे बिदेस। थोड़ा इधर का खाना भी चख लें। बाकी तो मुर्ग-कबाब बाहर से आना ही है। जेल के कंकर पत्थर वाले खाने पर हेल्थ नहीं बिगाड़नी है। भाई मियां, जेलों में कहीं मोबाइल बरामद हुए हैं, कहीं गांजा, कहीं नकदी। वैसे ये सब जरूरत की चीजें हैं। भूल चूक, लेनी देनी। मियां, मैं देश में बीसियों जगह हो आया पर जेल नहीं गया। सोचता हूं थोड़ी और सुविधा बढ़े और पनीर पकौड़े व शबर्ते अनार वगैरा मिलने लगे तो उधर भी हो आऊं।’

पान का लुआब घुटक कर बोले- ‘होगा क्या? सब रफा दफा। अकबर भी शेर ठोंक गए हैं- चश्मे जहां से हालते असली छुपी नहीं..अखबार में जो चाहे वही छाप दीजिए। इरादा हो तो बताना। साथ-साथ अंदर चलेंगे’।

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