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नशे में युवा

ऊर्जा, रचनात्मकता और आनंद से भरपूर युवावस्था अपने में जीवन और समाज का सबसे बड़ा नशा है। इसलिए हर समाज उसमें कोई और नशा घोलने के बजाय इसी को नियंत्रित और संचालित करने में लगा रहता है। समाज जानता है कि अगर उसके युवा बहके तो उसका भविष्य नहीं है और अगर वे संतुलित और सही राह पर हैं तो उस समाज को भविष्य की चिंता नहीं करनी है।

वह यह भी जानता है कि युवावस्था को पूरी तरह नियंत्रित करना संभव नहीं है, इसलिए युवकों की छोटी-मोटी शरारतों को नजरंदाज भी किया जाता है। लेकिन जब नियम- कानून को ताक पर रखकर सैकड़ों युवा शराब के नशे में झूमने के लिए बड़ी -बड़ी पार्टी आयोजित करें या नशे में धुत होकर सड़क पर लापरवाही से गाड़ी चलाएं और लोगों को टक्कर मारकर गुर्राएं, तब लगता है कहीं कुछ गड़बड़ हो रहा है।

पुणे जैसे शहर में फ्रेंडशिप डे के दिन 400 लड़के -लड़कियों का  दारू पार्टी में पकड़े जाना और नशे की हालत में हिरासत में लिया जाना सचमुच चिंताजनक है। पुणे ऐसा शहर रहा है जहां का शिष्टाचार और महिलाओं के लिए सम्मान और सुरक्षा का माहौल पूरे देश में मशहूर है।

कोई भी अभिभावक अपनी संतान को पुणे भेजकर उसकी सुरक्षा और अनुशासन के बारे में निश्चिंत होता रहा है, लेकिन जिस बड़े पैमाने पर छात्र-छात्राओं ने पुलिस इजाजत के बिना दारू पार्टी आयोजित की, उससे लगता है कि अब कोई भी अभिभावक अपनी संतानों को बाहर भेजकर पूरी तरह निश्चिंत नहीं हो सकता।

इसका मतलब यह नहीं कि समाज में युवाओं के भीतर बढ़ते खुलेपन के खिलाफ कट्टर रवैया अपनाया जाए। जाहिर-सी बात है कि अब युवा फ्रैंडशिप डे और वेलेंटाइन डे मनाते हैं और उसके बहाने युवक और युवतियां एक दूसरे के करीब भी आते हैं। यह स्थितियां अस्सी और नब्बे के दशक में बहुत कम थीं। तब देर रात न तो उन्हें घरों से बाहर जाने दिया जाता था न ही हॉस्टल से।
  
अब पढ़े-लिखे युवाओं में अपने जीवन के प्रति स्वच्छंद दृष्टि है और आत्मविश्वास भी। इसलिए वे मेहनत और मौज-मस्ती दोनों को मिलाकर अपने जीवन को नई परिभाषा दे रहे हैं। उनकी इस परिभाषा को गढ़ने में बाजार भी उनकी भरपूर मदद कर रहा है।

बाजार और युवा दोनों को एक दूसरे की जरूरत है, इसलिए उन्हें दूर किया भी नहीं जा सकता। लेकिन इसी के साथ हमें यह भी नहीं भूलना चाहिए कि समृद्ध बाजार के साथ स्वस्थ समाज की उपस्थिति भी उतनी ही जरूरी है। स्वस्थ समाज कट्टर नहीं होता। वह उदार होता है  पर उसमें इतनी आत्मशक्ति जरूर होती है कि वह नशे की तरफ बढ़ते युवाओं को संचालित कर सके। आए दिन शराब के नशे में धुत युवा कहीं दुर्घटना का शिकार होकर अपने को अपंग बना रहे हैं तो किसी की जान ले रहे हैं।

अगर कहीं वे संपन्न और सत्ताधारी तबके से जुड़े हैं तो उनका नशा दोगुना होता है और वे अपने को कानून व्यवस्था से भी ऊपर समझते हैं। चिंता की बात यह है कि वे पकड़े जाने पर अपनी गलती मानने और लत छोड़ने के बजाय पुलिस बलों पर हमला भी कर बैठते हैं। इसका नुकसान पूरे समाज के साथ वे युवा भी उठाते हैं। इसलिए आज समाज और उसकी संस्थाओं को अपने युवाओं को लेकर कट्टर नहीं, लेकिन ज्यादा चौकस होने की जरूरत है।

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