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म्यांमार की समस्या और भारत के हित

म्यांमार के एकांतवासी सैन्य नेता जनरल थान श्वे भारत की पांच दिनों की यात्रा पर हैं। यह सैनिक जुंता के किसी नेता की साल में दूसरी भारत यात्रा है। इस यात्रा के दौरान भारत ने उनका भव्य स्वागत किया है। वे स्टेट पीस एंड डेवलपमेंट कौंसिल के अध्यक्ष हैं।

भारत ने उनके साथ कई समझौतों पर दस्तखत किए हैं। उनमें आपराधिक मामलों में पारस्परिक कानूनी सहयोग, आतंकवाद विरोध, विकास परियोजनाएं, विज्ञान और प्रौद्योगिकी और सूचना सहयोग संबंधी संधियां शामिल हैं। म्यांमार के प्रमुख पर्यटक स्थल बागान के आनंद मंदिर को संवारने के लिए भारत ने सहयोग के बारे में एक सहमति पत्र पर हस्ताक्षर किए हैं।

इस दौरान दो मुद्दों को सबसे ज्यादा महत्व मिला जिनमें ऊर्जा संबंधी सहयोग और भारत -म्यांमार की 1650 किलोमीटर लंबी सीमा पर सक्रिय पूर्वोत्तर के उग्रवादी शामिल हैं। भारत की योजना अगले कुछ सालों में म्यांमार के ऊर्जा क्षेत्र में एक अरब डालर का निवेश करने की है।

जिन ढांचागत और विकास परियोजनाओं पर चर्चा की गई उनमें भारत-म्यांमार थाइलैंड हाईवे विकास परियोजना, एनएचपीसी की तरफ से बनाई जाने वाली एक जल- विद्युत परियोजना, टाटा मोटर्स की तरफ बनाया जाने वाला एक ट्रक असेंबली प्लांट और मिजोरम -म्यांमार सीमा पर एक व्यापार चौकी शामिल हैं।

भारत और म्यांमार के सीमाई इलाकों को फिर से व्यवस्थित करने के लिए म्यांमार इस बात पर सहमत हुआ है कि वह भारतीय मूल के लोगों को नागरिकता का कार्ड देगा, भले उनके पास कोई दस्तावेज न हो। यह इस बात का संकेत है कि म्यांमार भारत को आर्थिक और व्यापारिक रिश्तों में शामिल करना चाहता है। इसी मकसद के तहत थान श्वे ने भारत की सूचना प्रौद्योगिकी के अहम केंद्र बंगलूर और औद्योगिक केंद्र जमशेदपुर का दौरा किया।

थान श्वे ने भारत का दौरा उस समय किया है जब कुछ दिनों पहले अमेरिका की विदेश मंत्री हिलेरी क्लिंटन ने आसियान की एक बैठक में क्षेत्रीय देशों से अपील की थी कि वे म्यांमार पर इस बात के लिए दबाव डालें कि वह संयुक्त राष्ट्र मानवाधिकार प्रस्तावों को माने और एटमी अप्रसार के वायदे को पूरा करे। क्लिंटन का कहना था कि म्यांमार में नागरिकों का जीवन खतरे में है। उन्होंने भारत सहित दूसरे देशों से अपील की थी कि वे म्यांमार में लोकतांत्रिक सुधार के लिए दबाव डालें।

अमेरिका इस बात से बेचैन है कि म्यांमार जुंता भारत से बढ़ती नजदीकी का इस्तेमाल अपनी वैश्विक वैधता के लिए करेगा। अमेरिका के सहायक विदेश मंत्री कुर्त कैंपबेल ने सुझाव दिया है कि वैश्विक राजनीति में भारत के बढ़ते असर का इस्तेमाल म्यांमार में शासन कर रहे सख्त सैनिक समूह को भेदने के लिए किया जा सकता है।

भारत भी म्यांमार के सैनिक जुंता का का कड़ा आलोचक रहा है, लेकिन 1990 के दशक के मध्य से उसने आंग-सांग-सू-की को मौखिक समर्थन देना बंद कर दिया। उसके बाद भारत ने पूर्वगामी नीति के उद्देश्यों को हासिल करने के लिए पूर्व और दक्षिण पूर्व एशिया के आर्थिक रूप से आगे बढ़ते देशों से अच्छे संबंध बनाने शुरू कर दिए। इनमें सबसे महत्वपूर्ण बात यह है कि म्यांमार में चीन का महत्व बहुत तेजी से बढ़ा है।

लोकतंत्र के प्रति भारत के विचारधारात्मक आग्रह के चलते म्यांमार चीन की तरफ झुक गया। इसलिए भारत को मजबूरन म्यांमार की स्थितियों का ज्यादा यथार्थवादी आकलन करना पड़ा। भारत के पास ज्यादा विकल्प नहीं बचे थे, बल्कि उसे वहां की सैनिक सत्ता से उसी तरह व्यापार, ऊर्जा और रक्षा के क्षेत्र में सहयोग का हाथ बढ़ाना पड़ा जिस प्रकार चीन ने बढ़ाया था।

भारत को जैसे ही अहसास हुआ कि उसका एक बेहद करीबी पड़ोसी और प्राकृतिक गैस का प्रमुख स्रोत म्यांमार तेजी से चीन के करीब जा रहा है, उसने म्यांमार के सैनिक जुंता को दरकिनार करने की दशकों पुरानी नीति को त्याग दिया और उससे सीधे संबंध बढ़ाने लगा। स्थिति यह है कि भारत म्यांमार के बारे में पश्चिमी देशों की नीति पर नहीं चल सकता। भारत के रणनीतिक हितों की मांग है कि वह वहां के सैनिक शासकों को लोकतंत्र के मुद्दे पर प्यार से ही समझांए।

सन् 2008 में म्यांमार में आए भयंकर तूफान नरगिस से हुई तबाही में भारत ने जो बचाव काम किया था, उसकी वहां काफी वाहवाही हुई। इससे म्यांमार शासक वर्ग के सर्वोच्च लोगों में भारत के प्रति यकीन बढ़ा है और उसे खोना भारत के लिए समझदारी नहीं होगी। इसलिए भारत अगर म्यांमार पर लगाए जाने वाले पश्चिमी प्रतिबंधों के खिलाफ है तो इसमें हैरान होने की कोई बात नहीं है।

छह साल तक चली चर्चा के बाद भारत 12 करोड़ डालर की लागत से सिट्वे बंदरगाह बनाने को तैयार हुआ है। इससे बांग्लादेश गए बिना भारत से दक्षिण पूर्व एशिया जाने का वैकल्पिक मार्ग खुल जाएगा। भारत ने थैनलीन रिफाइनरी के सुधार के लिए दो करोड़ डालर का कर्ज देने का भी फैसला किया है। लेकिन इसी के साथ प्राकृतिक गैस की सप्लाई में अपना विशेष दर्जा पाने के लिए भारत ने अमेरिकी पाबंदी का विरोध कर वहां के सैनिक शासकों को खुश करने का भी प्रयास किया है।

भारत और म्यांमार के बीच दोतरफा व्यापार करीब एक अरब डालर का है। वहां के सैनिक शासकों ने नगा उग्रवादियों का सफाया करने में भारत की मदद की है, जिन्होंने म्यांमार की सीमा पर अपने ठिकाने बना रखे थे। भारत और म्यांमार की लंबी सीमा खुली हुई है, जहां आदिवासी आबादी 20 किलोमीटर इधर-उधर जा सकती है।

भारत के सीमा सड़क संगठन ने 2001 में 160 किलोमीटर लंबी भारत-म्यांमार मैत्री मार्ग का निर्माण किया था। अब भारत दूसरी सड़क परियोजना को हाथ में लेने और बंगाल की खाड़ी में तेल और गैस निकालने के लिए सागर समृद्धि परियोजना में भी निवेश करने की सोच रहा है। इसके अलावा पश्चिमी म्यांमार में श्वे गैस पाइप लाइन परियोजना भी भारत की निगाह में है। 

जिस समय बर्मा के सैनिक शासक लोकतंत्र समर्थक बौद्ध भिक्षुओं पर हिंसक हमला करने की तैयारी कर रहे थे उस समय भारत के पेट्रोलियम मंत्री यंगून में रखाइन के तट के गहरे पानी के तीन इलाकों से तेल निकालने वाले समझौते पर दस्तखत कर रहे थे। हालांकि भारत म्यांमार के खिलाफ संयुक्त राष्ट्र मानवाधिकार परिषद के प्रस्ताव का समर्थन तो करता है, लेकिन वह उस पर थोड़ा नरम हुआ ताकि एक तरफ उसकी लोकतांत्रिक छवि बनी रहे और दूसरी तरफ वह बर्मा की सैनिक सरकार से संबंध भी बनाए रख सके।

harsh.pant@kcl.ac.uk

लेखक किंग्स कॉलेज लंदन में प्राध्यापक हैं

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