अगली स्टोरी

class="fa fa-bell">ब्रेकिंग:

घाटी की लपटें

कश्मीर की स्थितियां बेहद जटिल और गंभीर हो चली हैं और उनका समाधान अब राज्य सरकार के वश में दिखता नहीं है। मुख्यमंत्री उमर अब्दुल्ला और उनके पिता व राज्य के पूर्व मुख्यमंत्री फारूक अब्दुल्ला की अपील के बाद भी जनता का आक्रोश और हिंसा शांत होने के बजाय नए दुश्चक्र में फंसती जा रही हैं।

हिंसा की कोई घटना अगली घटना की तरफ न बढ़ने की समझ और दलील पैदा करने के बजाय और हिंसा करने का बहाना बन रही है। इसीलिए कुछ समय के लिए शांति की उम्मीद जगने के बाद पूरी घाटी में फिर कर्फ्यू लगाना पड़ा है। ऐसी स्थिति में केंद्र सरकार कोई राजनीतिक पहल कर पाएगी इसकी संभावना कम ही लगती है। यही वजह है कि महीने भर में दूसरी बार सुरक्षा मामलों की कैबिनेट कमेटी की बैठक हुई है, पर स्थितियों की समीक्षा करने से आगे कोई पहल दिखाई नहीं पड़ रही है। 

सवाल यह है कि इस समय केंद्र सरकार अगर राजनीतिक संवाद कायम भी करे तो किसके साथ। अलगाववादियों के शीर्ष नेता सैयद अली शाह गिलानी, यासीन मलिक और मीरवाइज जैसे नेता या तो जेल भेज दिए गए हैं या नजरबंद हैं। पूरा आंदोलन दूसरी कतार के नेता मशरत आलम और दुख्तराने मिल्लत की आयशा अंदराबी जैसे नेताओं की अगुआई में चल रहा है। पर आंदोलन के स्वर से एक बात साफ लग रही है कि यह मामला महज बेहतर गवर्नेस और बेरोजगारी मिटाने का नहीं है।

यह मामला उससे आगे जाकर कश्मीर समस्या का स्थायी समाधान मांगने का है। जो बात पिछले विधानसभा चुनाव में अप्रासंगिक से हो चुके हुर्रियत कांफ्रेंस के अलगाववादी नेता कहने का साहस नहीं जुटा पा रहे थे वह जनता खुद कह रही है। इस आंदोलन में उन युवकों की बड़ी संख्या है जो पहले उग्रवाद में सक्रिय रहे हैं और अब मुख्यधारा में लौटने लगे थे। लेकिन मुख्यधारा में अपनी आर्थिक और राजनीतिक जगह हासिल न कर पाने के कारण उन्होंने एके -47 की जगह पर आंदोलन, पथराव और आगजनी के नए हथियार उठा लिए हैं।
  
घाटी में घिरे इस अराजकता और भ्रम के अंधेरे के बीच उम्मीद की कुछ किरणों भी हैं। कहा जा रहा है कि इस आंदोलन ने पर्यटन के सीजन को तबाह कर दिया है। शिकारा वालों के लिए पुणे, मुंबई, दिल्ली और बंगलूर वगैरह में पढ़ाई कर रही अपनी संतानों का खर्च उठाना मुश्किल हो रहा है। वे अपना शिकारा और हाउसबोट बेचकर जम्मू में पनाह लेने की सोच रहे हैं।

इस दुश्चक्र में फंसा आम कश्मीरी अपनी संतानों को शांत होने के लिए समझा नहीं पा रहा है। लेकिन उनके इस उकसावे के पीछ सोपोर और बारामूला के संपन्न सेब व्यापारियों का हाथ बताया जा रहा है। अब जबकि सेब का सीजन नजदीक है, क्या वे इस आंदोलन को लंबे समय तक खींच पाएंगे? उन्होंने गरीब आदमी की रोजी-रोटी जरूर तबाह कर दी, पर क्या वे अपना लाखों का कारोबार ठप करेंगे?

पर हमारे सुरक्षा बलों और सरकारों को इसी के भरोसे बैठा नहीं रहना चाहिए। उन्हें घाटी में पैदा हुई इस विशेष तरह की हिंसा से निपटने के लिए अपने को विशेष तौर पर प्रशिक्षित करना चाहिए, जिसमें उनका धैर्य भी बरकरार रहे और जन-धन की हानि भी कम से कम हो। साथ ही सरकार को कश्मीर समस्या के राजनीतिक समाधान के लिए सभी पक्षों से बातचीत का सिलसिला आगे बढ़ाना चाहिए।

  • Hindi Newsसे जुडी अन्य ख़बरों की जानकारी के लिए हमें पर ज्वाइन करें और पर फॉलो करें
  • Web Title:घाटी की लपटें