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कहां है मंदी..

मंदी का दौर चल रहा है। पूरी दुनिया में। अच्छी- अच्छी कंपनियों की हवा निकल गई है। सालों से जमे- जमाये कर्मचारी सड़क पर आ गए हैं। ‘दिवालिये’ आलू की तरह थोक के भाव मार्केट में उपलब्ध हैं। इस आपाधापी में कुछ खानदानी भिखारी भी सीना ठोंक कर खुद को पूर्व उद्योगपति कहने लगे हैं। लेकिन, इसी मंदी को देखने का दूसरा चश्मा भी है। जिससे मैंने देखा। मुलाहिाा हो-ड्ढr मां बनने में आज भी नौ महीने का समय लग रहा है।ड्ढr ड्ढr मंदी का प्रभाव होता तो बारह, चौदह या सोलह लगने चाहिए थे। मेरी गली का कुत्ता अब भी पूरी रात भौंकता है। कहां है मंदी। होती तो आधी रात या कुछ घंटे भौंककर चुप्पी मार सो रहता। पड़ोसी की मुर्गी हफ्ते में औसतन चार अंडे देती है। बराबर दे रही है। मंदीग्रस्त होती तो कम देती या एकदम गोल कर जाती। आप खड़े रहिये कटोरा लिए इंतजार में। और देखिये- कर्मचारियों की हड़ताल चल रही है। नार वैसे ही लग रहे हैं। पोस्टर- बैनर, धरना- प्रदर्शन आदि सांस्कृतिक कार्यक्रम बदस्तूर जारी हैं। कहां है मंदी। हड़ताल करने को कर्मचारी न मिलते या पोस्टर का मैटर कर्मचारी अपनी पीठ पर लिखवाकर घूमते तो समझ में आता कि मंदी का असर है। जिन कार्यालयों में काम हो रहा है, उनमें घूस के रट पर कोई प्रभाव नहीं पड़ा। मंदी का दौर है तो पांच-दस परसेंट का कन्सेशन देना चाहिए था। बीएसएनएल के नेटवर्क पर मंदी का कोई असर नहीं है। पहले भी रुलाता था। आज भी रुलाता है। सरकारी अस्पतालों में डॉक्टरों, स्कूलों में शिक्षकों, पुलिस में सिपाहियों, नगर निगम और बिजली विभाग में ईमानदार लोगों की कमी पहले भी थी। आज भी है। उम्मीद है आप मेर तर्को से असहमत न होंगे।ं

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