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महंगाई पर संसद ठप करने का कारण

पिछले हफ्ते तमाम आवश्यक वस्तुओं की कीमतों में कमरतोड़ बढ़ोतरी ने संसद का काम-काज ठप करा दिया है। यूपीए को छोड़कर संसद में लगभग सभी पार्टियों ने अलग-अलग ही सही, एक स्वर से यह मांग की है कि महंगाई के मुद्दे पर दोनों सदनों में ऐसी व्यवस्था के तहत बहस करायी जाए जिसका समापन मतदान पर हो। सरकार इस मांग को मानने के लिए ही तैयार नहीं हो रही है।

लोकसभा में स्पीकर ने कार्यस्थगन प्रस्ताव नामंजूर कर दिया। उधर राज्यसभा में सभापति ने नियम संख्या-184 के अंतर्गत (जिसके तहत बहस का समापन मतदान पर होता है) बहस कराने का प्रस्ताव न तो स्वीकार किया है और न ही अस्वीकार किया है।

सरकार बराबर इसी की दलीलें दे रही है कि वह ऐसे किसी भी नियम के अंतर्गत बहस कराने के लिए तैयार है, जिसमें मतदान की जरूरत न पड़ती हो। दूसरी ओर, यूपीए की ओर से बराबर इसका भी दावा किया जा रहा है कि लोकसभा में अपने संख्या बल को लेकर उसके लिए चिंता का कोई कारण नहीं है।

अगर वाकई ऐसा है तो सरकार ऐसे नियमों के अंतर्गत बहस से क्यों भाग रही है, जिनके अंतर्गत मतदान कराना होता है? जाहिर है अपने बहुमत को लेकर सरकार बहुत आश्वस्त नहीं है। वास्तव में सरकार को इसका डर है कि कहीं जनता के दबाव के चलते, उसके कुछ सहयोगी इस मुद्दे पर मजबूती से उसका साथ देने से बच निकलने की कोशिश न करने लगें।

संसद ने पिछले एक साल के दौरान कम से कम तीन मौकों पर लगातार बढ़ती तथा बेलगाम महंगाई के मुद्दे पर चर्चा की है। लेकिन, इनमें से किसी भी बहस में सरकार की ओर से कोई सकारात्मक प्रत्युत्तर नहीं मिला है। सरकार महंगाई पर अंकुश लगाने के कदम उठाने से ही इनकार नहीं करती रही है बल्कि उसने तो इसकी उल्टी दिशा में बढ़ते हुए, पेट्रोलियम उत्पादों की कीमतें में और बढ़ोतरी ही थोपी है।

सरकार के इस कदम ने न सिर्फ मुद्रास्फीति को और बढ़ाया है बल्कि प्रत्यक्ष व परोक्ष, दोनों ही तरीकों से जनता पर और ज्यादा बोझ डाला है? ऐसे नियम के अंतर्गत बहस का आग्रह करने के जरिए जो मतदान तक ले जाए, हम सरकार पर इसके लिए दबाव डालना चाहते हैं कि इस महंगाई पर अंकुश लगाने के लिए ठोस कदम उठाए।

कम से कम तीन ऐसे ठोस फौरी कदम हैं, जो जनता को कुछ राहत दिलाने के लिए सरकार उठा सकती है। पहला तो यही कि अब जबकि सरकार ने करीब-करीब पेट्रोलियम उत्पादों की कीमतों से नियंत्रण उठा ही लिया है, तब बजट में पेट्रोलियम उत्पादों की कीमतों में जो बढ़ोतरी की गयी थी उसे वापस लिया जाना चाहिए। लोकसभा में जब इस पर बहस हुई कि स्थगन प्रस्ताव स्वीकार किया जाए या नहीं, वित्तमंत्री ने बजट में की गयी बढ़ोतरियों को वापस न लेने की अपनी दलील भी घुसा दी। उन्होंने यह तो माना कि बजट में पेट्रोलियम उत्पादों पर 1,08,000 करोड़ रुपये के शुल्क लगाए गए थे।

लेकिन, उनका कहना था कि इसमें से 24,000 करोड़ रुपये तो सब मिलाकर राज्यों को ही दिए जाएंगे। इसके बाद केंद्र के पास बचेंगे 84,000 करोड़ रुपए। इसके बाद हाथ की सफाई दिखाते हुए उन्होंने यह दावा पेश कर दिया कि राज्यों द्वारा पेट्रोलियम उत्पादों पर लगाए गए शुल्कों के जरिए 72 हजार करोड़ रुपये बटोरे जा रहे हैं। इसमें केंद्र से राज्यों को मिलने वाला हिस्सा जोड़कर, राज्यों के हिस्से में आएंगे 96 हजार करोड़ रुपये जबकि केंद्र के हिस्से में सिर्फ 84 हजार करोड़ रुपये ही आएंगे।

इस दलील में वित्त मंत्रीजी की हाथ की सफाई कहां है? उनकी हाथ की सफाई यह है कि केंद्र सरकार के हाथों में जो 84 हजार करोड़ रुपये जा रहे हैं, उनका पूरा का पूरा बोझ तेल उत्पादों की कीमतों में बढ़ोतरी के जरिए जनता पर डाल दिया गया है। दूसरी ओर, राज्यों के हिस्से में आने वाला 96 हजार करोड़ रुपये वास्तव में देश के सभी 28 राज्यों द्वारा मिलकर हासिल किया जाने वाला कर का हिस्सा है।

औसतन हरेक राज्य पर यह राशि 3428 करोड़ 57 लाख रुपये बैठती है। यह वह बोझ है जो राज्य सरकार द्वारा वसूल किए जाने वाले कर के चलते संबंधित राज्यों में रहने वाले लोगों पर पड़ता है, जबकि केंद्रीय करों के जरिए 108 हजार करोड़ रुपये की वसूली का बोझ पूरे देश की जनता पर पड़ता है।

दूसरा कदम जिसकी मांग सरकार से बराबर की जाती रही है, वह यह है कि सरकार के गोदामों में अनाज के जो पहाड़ जमा हो गए हैं उन्हें राज्यों को आवंटित कर दिया जाए, जो सार्वजनिक वितरण प्रणाली के जरिए इसका वितरण करें। अगर ऐसा किया जाता है तो इसका असर खाद्यान्न की आम कीमतों पर पड़ेगा तथा मुद्रास्फीति का दबाव कम होगा। लेकिन, सरकार ने ऐसा करने से भी इनकार कर दिया जबकि उसके गोदामों में अनाज पड़ा सड़ रहा है।

वास्तव में सुप्रीम कोर्ट ने भंडारण की सुविधाओं के अभाव में अनाज बारिश में सड़ने देने के लिए सरकार को फटकार लगाकर, हमारी इस मांग के सही होने का ही प्रमाण दिया है। सर्वोच्च न्यायालय ने सरकार से पूछा है कि अनाज सड़ने देने की जगह, उसे भूखों के बीच बांट क्यों नहीं देती है। सरकार ने उसके सवालों का एक अमानवीय चुप्पी से ही जवाब दिया है।

तीसरा कदम जो हमने बार-बार सुझया है, यही है कि सभी आवश्यक वस्तुओं में वायदा व्यापार पर रोक लगायी जाए क्योंकि यह कीमतों को ऊपर चढ़ाता है। इन एक्सचेंजों में मालों के लेन-देन में तभी मुनाफा बनता है, जब किसी माल का सौदा जिस भाव पर हो, आगे उससे ज्यादा भाव पर उसका सौदा हो सकता हो। 2010 के एक अप्रैल से 30 जून के बीच माल एक्सचेंजों में कुल 25,55,987 करोड़ 26 लाख रुपये का कारोबार हुआ था। पिछले साल में इसी अवधि के लिए यही आंकड़ा 15,64,114 करोड़ 96 लाख रुपये का था।

अगर मतदान तक ले जाने वाले नियमों के तहत चर्चा होती है, इन तीनों ही पहलुओं से सरकार पर बहुत भारी दबाव होगा। अगर इस दबाव में सरकार को इस महंगाई पर अंकुश लगाने के लिए कदम उठाने के लिए मजबूर कर दिया जाता है, तो इससे जनता को बहुत भारी राहत मिलेगी। सरकार इसी दबाव से तो बचने की कोशिश कर रही है।

लेखक माकपा के पोलित ब्यूरो सदस्य हैं

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