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उर्दू मीडिया : शाह के बहाने मोदी

गुजरात के गृहमंत्री रहे अमित शाह के सोहराबुद्दीन फर्जी एनकाउंटर मामले में सीबीआई के हत्थे चढ़ने के साथ ही नरेंद्र मोदी उर्दू मीडिया के निशाने पर आ गए हैं। अखबारों के रवैये से लगता है मोदी के करीबी समझे जाने वाले अमित शाह की एक-एक हरकतों का उन्हें इल्म रहा होगा। यहां तक कि फर्जी एनकाउंटर कराने से लेकर सोहराबुद्दीन की पत्नी कौसर बी की हत्या की साजिश रचने की जानकारी भी। इस मामले में सीबीआई उनसे पूछताछ करती है तो कई और रहस्यों पर से पर्दा उठ सकता है।

गुजरात दंगे में सरकार की भूमिका के आरोप से आज भी मोदी बरी नहीं हुए हैं। फर्जी एनकाउंटर में संलिप्तता का आरोप झेल रहे अधिकांश अफसरों के दंगे के समय अहमदाबाद पुलिस में बड़े ओहदे पर होने के चलते भी उर्दू अखबार अमित शाह मामले में मोदी की भूमिका की जांच सीबीआई से कराना चाहते हैं।

‘सियासत’, ‘अब नरेंद्र मोदी की बारी’ में कहता है- अमित शाह ने गृहमंत्री रहते जो कुछ किया उसकी जानकारी मोदी को न हो ऐसा संभव नहीं लगता। अखबार सीबीआई के हवाले से कहते हैं कि सोहराबुद्दीन अमित शाह जैसे बड़े सियासतदानों और भ्रष्ट आला पुलिस अफसरों के अवैध गठजोड़ की कड़ी भर था। वह उनके लिए अवैध वसूली किया करता था।

‘रोजनामा ऐतमाद’ मीडिया रिपोर्ट के हवाले से कहता है- एक बड़े मार्बल कारोबारी को अधिक परेशान करने पर उसने राजस्थान के तत्कालीन गृहमंत्री गुलाबचंद कटारिया को सोहराबुद्दीन की हत्या कराने के लिए 10 करोड़ रुपये दिए थे। अखबार कहते हैं भेद खुलने के डर से एनकाउंटर के नाम पर उसकी हत्या करवा दी गई। 

‘सहाफत’, ‘खून फिर खून है टपकेगा तो जम जाएगा’ में कहता है- नरेंद्र मोदी ने सत्ता में आने पर गुजरात के हिन्दुओं को जिहादियों और दहशत फैलाने वालों से हिफाजत का वादा किया था। सोहराबुद्दीन और उसकी पत्नी कौसर बी की हत्या ने भाईचारे पर विश्वास करने वाले गुजरातियों को शर्मशार कर दिया है।

अखबार कहते हैं- नरेंद्र मोदी के मायाजाल का असर है कि हेडली से पूछताछ करने वाले जांच दल ने मासूम इशरत जहां को लश्कर का मुजाहिदीन करार दे दिया। अखबार कहता है- 12 जून 2004 को मुंबई से इशरत जहां और उसके दो साथियों को उठाने के बाद गुजरात के एक फार्म हाउस में रखकर यातनाएं दी गई थीं। बाद में उन पर मोदी की हत्या की नीयत से अहमदाबाद आने का आरोप लगाकर फर्जी मुठभेड़ में मार गिराया गया। 

मुंबई का ‘इंकलाब’ कहता है अमित शाह की गिरफ्तारी से बीजेपी की किरकिरी हुई है।  ‘सोहराबुद्दीन केस और बीजेपी का खौफ’ में एक अखबार कहता है-सोहराबुद्दीन, कौसर बी और उनके साथी तुलसीराम प्रजापति की हत्या का भूत बीजेपी पर सवार है। इसलिए सीबीआई पर ‘कांग्रेस ब्यूरो ऑफ इनवेस्टिगेशन’ का तोहमत लगाया जा रहा है। लालकृष्ण आडवाणी, नितिन गडकरी और सुषमा स्वराज तो इस मामले में राष्ट्रपति प्रतिभा पाटिल से शिकायत भी कर चुके हैं।

सुहैल हलीम एक अखबार में कहते हैं- पीएम ने स्पष्ट कर दिया कि सोहराबुद्दीन केस में हुकूमत की कोई भूमिका नहीं है। सब कुछ सुप्रीम कोर्ट के दिशा-निर्देश पर हो रहा है। ‘हमारा समाज’ में सैयद अतहर अली लिखते हैं-‘अभी तो कई अमित शाह साहब सरकार में हैं। गुजरात दंगा प्रकरण में मोदी मंत्रिमंडल के एक सदस्य को जलालत झेलनी पड़ रही है। इस मामले मे नरेंद्र मोदी खुद जांच के घेरे में हैं।

अखबारों को विश्वास है सोहराबुद्दीन और उसकी पत्नी की हत्या के आरोपी बंजारा, राजकुमार पांडया, अभय जोड़ा, राजस्थान कैडर के आईपीएस अधिकारी एन. दिनेश आदि से जुड़े एक-एक पहलू को खंगालने पर कुछ और गड़े मुर्दे उखड़ सकते हैं। ‘जवाबदेही का एहसास सबसे ज्यादा जरूरी’ में एक अखबार कहता है- तय है हुकूमत न चाहे तो किसी संगीन मामले की न तो पुलिस और न ही जांच एजेंसियां सही पड़ताल कर सकती हैं। अमित शाह प्रकरण जैसे मामले और भी हैं।
 
गुजरात दंगा और बाबरी मस्जिद उर्दू अखबारों की गहरी दिलचस्पी के विषय रहे हैं। इत्तेफाकन अभी दोनों गरमाए हुए हैं। लंबे समय से बाबरी मस्जिद की मिल्कियत को लेकर उत्तर प्रदेश उच्च न्यायालय में चल रहे मामले में लखनऊ बेंच ने 30 सितंबर तक के लिए फैसला सुरक्षित रखा है। अखबार कयास लगा रहे हैं कि कोर्ट का फैसला किस के पक्ष में हो सकता है। इस मामले में दूसरे पक्ष के उन पुराने बयानों को भी कुरेदा जा रहा है जिसमें कहा गया था कि कोर्ट उनके खिलाफ फैसला देती भी है तो उनकी आस्था नहीं बदलेगी।  लेकिन ‘जदीद खबर’अखबार कहता है ‘फैसला आने से पहले इस पर तबसरा करना फिजूल होगा।’

लेखक हिन्दुस्तान से जुड़े हैं

malik_hashmi64@yahoo.com

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