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आज का युगधर्म

कोई आधुनिक कहे या उत्तर आधुनिक। इस पावन युग का मूल मंत्र पैसा है। पैसा है तो पॉवर है। पॉवर है तो प्रसिद्घि है। प्रसिद्धि है तो सिद्धि है। सिद्धि है तो सफलता है। बड़ा सीधा गणित है। जित्ती बड़की कार, उत्ता बड्डा आदमी। जित्ती बड़ी कोठी, उत्ता कामयाब इंसान। साधन महत्वपूर्ण नहीं है। अहम जो है, वह केवल समृद्धि का जगमगाता साध्य है। न अब अच्छे-बुरे साधन हैं न इंसान, बस सफल-असफल दो-पाये हैं। चोरी, डकैती, अपहरण, सब जायज धंधे हैं। झूठ, फरेब सब माफ है यदि सफलता साथ है।

यह प्रदूषण मन के विशुद्ध माहौल में तब उत्पन्न हुआ जब हमने घर में एक जबरजंग कद्दू के दर्शन किये। आज के दुर्दिनों में कद्दू का कद भी छोटा हो गया है। एक बार हमने राजस्थान में राजपूतों के जिरह-बख्तर, तलवार वगैरह देखी थी। तब के आदमी और कद्दू दोनों ही क्या विशालकाय रहे होंगे! आज के आदमी और कद्दू दोनों पूर्वजों के लघु संस्करण हैं। पत्नी ने सन्नाटा तोड़ा- ‘यह कुछ अस्वाभाविक रूप से मोटा कद्दू है। लगता है कि इसे ऑक्सीटोक्सिन की सुई लगाकर बड़ा किया है।’

हमें उनके इरादे समझ आ गये। यह सारी साजिश हमें पूड़ी खाने से रोकने की है। खाने की चीजों में मिलावट, दुकानदारों का जन्मसिद्ध अधिकार है। हमने तो आज तक नहीं सुना है कि फल-सब्जी खाकर कोई टें बोले। यह ज़रूर है कि सब्जी तो कभी नसीब हो भी जाये, फल तो ईद का चांद है। जहरीली दारू पीकर जानें जाती हैं। जाती रहें। स्कॉच पीने वाले मंत्री, नेता जैसे को इससे क्या फर्क पड़ता है? बाकी तो मच्छर-मक्खी हैं। सियासत में अपराध की, अफसर में घूसखोरी की, खेलों में यौन शोषण की, मिलावट आम है तो फल, सब्जी, दवाओं में क्यों न हो! मिलावट तो आज का नैतिक युग-धर्म है!

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