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इतना क्यों सोते हो

अभी दो घंटे ही हुए थे ऑफिस में आए। लेकिन वह उनींदे से हो रहे थे। उनके साथी ने पूछा, ‘क्या तबीयत ठीक नहीं है?’ वह बोले ‘यार, ऐसी बात तो नहीं। लेकिन कई दिन हुए ठीक से नहीं सो पाया। मैं जब तक आठ घंटे की नींद न ले लूं, तब तक फ्रेश नहीं होता।’

हमारे लिए आठ घंटे की नींद जरूरी होती है। यह सुनते हुए ही हम बड़े होते हैं। लेकिन इंग्लैंड में रहने वाली भारतीय मूल की ऑर्गेनाइजेशनल कंसल्टैंट और फिजियोलॉजिस्ट डॉ. नरीना रामलखन का मानना है कि आठ घंटे की नींद एक मिथ है। इतने घंटे सोने की कोई जरूरत नहीं है। उनकी किताब ‘टायर्ड बट वायर्ड’ की इधर खूब चर्चा है।

अगर आठ घंटे नहीं, तो हमें कितने घंटे की नींद काफी है। डॉ. नरीना मानती हैं कि अगर कायदे से हम सोएं, तो पांच घंटे की नीद बहुत है। कायद से सोने का मतलब है कि हम क्वालिटी नींद लें यानी हम जब सोएं तो गहरी नींद आए। और वह नींद हम कोशिश से पा सकते हैं। उसके लिए हमें फोकस करने की जरूरत होती है। 

नींद के लिए फोकस! जी हां, नींद को भी फोकस करने की जरूरत पड़ती है। अक्सर हम योगियों के बारे में सुनते हैं कि वह दो-तीन घंटे ही सोते हैं। और उन घंटों में ही आम आदमी से ज्यादा तरोताजा नजर आते हैं। ये योगी जब सोते हैं, तो वह भी ध्यान की तरह होता है। और ध्यान से ज्यादा फोकस क्या हो सकता है? 

दरअसल, हमारा शरीर एक खास घड़ी का आदी होता है। यह घड़ी बाहरी नहीं, हमारे भीतर की होती है। अगर हम उसे अपने हिसाब से सेट कर लें, तो मन मुताबिक नींद तय कर सकते हैं। तब हम आठ घंटे के मिथक को तोड़ सकते हैं। एक कोशिश तो हम भी कर ही सकते हैं।

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