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अब छात्र बना रहे हैं सेटेलाइट

भारत की युवा प्रतिभा का लोहा दुनिया मान रही है। नब्बे के दशक में जब दुनिया भर में आईटी क्रांति का बिगुल फूंका गया था तब भारत ही इस क्रांति का पहरुआ बना था। और अब हर कोई इस बात से वाकिफ है कि आईटी की दुनिया में भारत के युवाओं की तूती बोलती है। पिछले दो दशकों में आईटी क्रांति के साथ-साथ स्पेस की दुनिया में नई इबारत लिखी लिखी जा रही थी। इसी क्रम में भारत ने स्पेस में कई सेटेलाइट छोड़े और चांद मिशन में कामयाबी हासिल की।

आईटी की तरह अंतरिक्ष अभियानों को भी युवाओं की भागीदारी ने सफल बनाया। हाल ही में हैदराबाद और बेंगलुरू के छात्रों ने पिको सेटेलाइट स्टुडसैट को छोड़कर दुनिया को चौंका दिया है। प्रमुख बात है कि यह भारत का पहला पिको सेटेलाइट है। इसका वजन मात्र 850 ग्राम है। यही नहीं, अभी तक इसरो ने पिको सेटेलाइट लांच नहीं किया है।

क्या होगा सेटेलाइट से
इस सेटेलाइट में कम्युनिकेशन, पावर और एट्टीटय़ूड कंट्रोल सिस्टम, एन-बोर्ड कंप्यूटर और एक कैमरा लगा हुआ है जो कि पिक्चर लेगा। सेटेलाइट स्टुडसैट के साथ एक कैमरा लगा हुआ है जो 637 किलोमीटर की ऊंचाई से 90 मीटर के रेजोल्यूशन  (फोटोग्राफ का प्रत्येक पिक्सल करीब 90 मीटर कवर करता है जितना कम रेजोल्यूशन होगा, उतनी ही बेहतर तस्वीर आएगी) तस्वीरें हैम कोड में ले सकता है। इस कैमरे से पृथ्वी की तस्वीरें ली जा सकती हैं, जिससे स्टूडेंट्स खुद ही मौसम का आंकलन कर सकते हैं। अपने स्टुडसैट से डेटा रिसीव करने के लिए स्टूडेंट्स ने बंगलौर में एक ग्राउंड कंट्रोल रूम भी बनाया है। यह अपने आप में एक बड़ी उपलब्धि है।

स्टुडसैट नाम क्यों ?
सेटेलाइट का आकार 10*10*13.5 सेमी का है यानी करीब-करीब एक पिज्जा बॉक्स के जितना। यह भारत का सबसे छोटा और हल्का सेटेलाइट है। इसे बेंगलुरू और हैदराबाद के 40 स्नातकों ने मिलकर बनाया है। उन्होंने इसका नाम रखा है स्टुडसैट (स्टूडेंट सेटेलाइट)।

स्टुडसैट बनने की दास्तान
स्टुडसैट बनने की दास्तान बेहद रोचक है। इसरो सेटेलाइट सेंटर, बेंगलुरू के स्माल सेटेलाइट प्रोजेक्ट के प्रोजेक्ट डायरेक्टर डी.राघव मूर्ति छात्रों को स्पेस टेक्नोलॉजी के बारे में जानकारी दे रहे थे। जब उनका लेक्चर खत्म हुआ तो दस छात्र राघव मूर्ति के पास पहुंचे और उनसे पूछा कि क्या इसरो सेटेलाइट बनाने में मदद कर सकता है। राघव मूर्ति का जवाब था क्यों नहीं। फिर क्या था - यहीं से शुरू हो गया स्टुडसैट बनने का सिलसिला। सात कॉलेजों के 35 छात्रों ने मिलकर इस सोच को हकीकत में तब्दील कर डाला। लांच के पहले ही टीम को इंटरनेशनल एस्ट्रोनॉटिकल फेडरेशन ने हांस वान मुलाडाउ पुरस्कार दिया है। 

सेटेलाइट हैं पाइपलाइन में
इस बात में कोई दोराय नहीं कि स्टुडसैट की कामयाबी विज्ञान के छात्रों के लिए मील का पत्थर साबित होने जा रही है। यह सफलता अन्य छात्रों के लिए टॉनिक का काम करेगी। यह एक शुरुआत भर थी। आईआईटी कानपुर के छात्र ‘जुगनू’ के बाद अब दूसरे सेटेलाइट की डिजाइन पर काम कर रहे हैं। आईआईटी मुंबई के छात्र ‘प्रथम’ नाम के अपने सेटेलाइट को बनाने में जुटे हैं।

अन्ना यूनिवर्सिटी के 40 किलो के सेटेलाइट अनुसैट की कामयाबी के बाद चेन्नई की एसआरएम यूनिवर्सिटी और सत्यभामा यूनिवर्सिटी के छात्र भी 10 किलो से कम की दो सेटेलाइट्स विकसित करने में जुटे हैं। वेल्लौर इंस्टीटय़ूट ऑफ टेक्नोलॉजी के छात्रों ने टय़ूबसेट बनाया है जो कि पिको सेटेलाइट है जिसका वजन एक किग्रा से कम है। इन छात्रों के दल ने इसरो के विक्रम साराभाई स्पेस सेंटर के सदस्यों के साथ काम किया है।

अनुसैट
अन्ना यूनिवर्सिटी सेटेलाइट या अनुसैट अन्ना यूनिवर्सिटी ऑफ टेक्नोलॉजी, मद्रास के छात्रों द्वारा बनाया गया माइक्रोसेटेलाइट है। अनुसैट का वजन 40 किग्रा है। यह अपने साथ एमेच्योर रेडियो स्टोर और फॉरवर्ड कम्युनिकेशन सिस्टम ले गया है और कई तरीके की तकनीक रिसर्च करेगा।

छात्रों ने रॉकेट भी बनाया
इसरो ने छात्रों द्वारा कुछ दिनों पहले निर्मित रोहिणी- 200 सीरीज का रॉकेट लांच किया है। इसके पेलोड को वेल्लोर इंस्टीटय़ूट ऑफ टेक्नोलॉजी के छात्रों ने बनाया है। इस रिसर्च व्हीकल के मुख्य काम मापन और एटमॉस्फिरिक प्रयोग हैं। विक्रमसाराभाई स्पेस सेंटरकी देखरेख में विकसित इस राकेट में छात्रों ने ही थ्री-एक्सिस एक्सीलेरोमीटर भी लगाया है।

प्रथम सेटेलाइट
प्रथम एक भारतीय आयनोस्फीरिक रिसर्च सेटेलाइट है जिसको आईआईटी, मुंबई द्वारा ऑपरेट किया जा रहा है। इसका वजन करीब 7 किग्रा है। इसे मुंबई विश्वविद्यालय के छात्रों ने के.सुधाकर के नेतृत्व में बनाया है। यह सेटेलाइट अभी निर्माण की अवस्था में है और उम्मीद की जा रही है कि इस माह में इसकी प्री-लांच टेस्टिंग हो सकती है। लांच सहित प्रथम को बनाने की कुल कीमत 1.5 करोड़ है। प्रथम के दो पेपर प्राग में 27 सितंबर से 1 अक्तूबर, 2010 तक होने वाले वाले इंटरनेशनल एस्ट्रोनॉटिकल कांग्रेस के लिए चुने गए हैं। नासा के पूर्व एडमिनिस्ट्रेटर माइकल ग्रिफिन ने इस प्रोजेक्ट की जमकर सराहना की है।

आईआईटी कानपुर का जुगनू सेटेलाइट
मार्च में कानुपर आईआईटी की गोल्डन जुबली के अवसर पर वहां के छात्रों ने नैनो सेटेलाइट जुगनू राष्ट्रपति प्रतिभादेवी सिंह पाटिल को सौंपा। इसे इसरो के हवाले कर दिया गया। जुगनू भी नैनो सेटेलाइट है जिसका इस्तेमाल आपदा मॉनिटरिंग और कृषि के डाटा प्रदान करने के लिए किया जाएगा। तीन किग्रा के इस सेटेलाइट को बनाने में 2.5 करोड़ रुपए लगे हैं। जुगनू का सबसे प्राथमिक इंस्ट्रमेंट इसका माइक्रो इमेजिंग सिस्टम है।

इसके अलावा इसमें एक इंफ्रारेड कैमरा और जीपीएस रिसीवर लगा हुआ है। जुगनू का निर्माण कार्य 2008 में शुरू हुआ था। देखते ही देखते स्टुडसैट की टीम में प्रथम वर्ष से परास्नातक स्तर तक के 50 छात्र और विभिन्न संकायों के 14 प्रोफेशनल शमिल हो गए।

जुगनू में लगा ओबीसी डाटा हैंडलिंग, पेलोड ऑपरेशन, इरर हैंडलिंग और डायगनोसिस का काम करता है। जुगनू में लगा एडीसीएस स्पेस में सेटेलाइट का ओरिएंटेशन नियंत्रित करता है।  जुगनू जमीन के अंदर की मिट्टी की जानकारी, भूकंप से संबंधित जानकारी, नदियों के जल प्रदूषण की जानकारी और बाढ़ और प्रदूषण की जानकारी देगा।

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