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बॉलीवुड का नया सिक्का आमिर खान

बॉलीवुड का नया सिक्का आमिर खान

शहंशाह, किंग और अब मिस्टर परफेक्शनिस्ट.. अमिताभ, शाहरुख के बाद अब बॉलीवुड पर राज करने की बारी आमिर खान की है। एक्टर, डायरेक्टर, प्रोडय़ूसर से लेकर म्यूजिक, स्टोरी, मार्केट रिसर्च, दर्शकों की साइको एनालिसिस और सेल्समैनशिप .. आमिर हर फील्ड में  मुकम्मल विशेषज्ञ की तरह नजर आते हैं, मानो इसी के लिए बने हैं। उन्होंने आम जीवन के सब्जेक्ट्स पर जोखिम उठाए और फायदा कमाकर दिखाया। कमिटमेंट इतना कि साल में एक फिल्म करने की ठान ली तो उसे करके दिखाया। ऐसे ‘इडियट’ की बात करते हैं, जो हर क्षेत्र में हों तो देश कहां से कहां पहुंच जाए।

डिमांड में फिट इसीलिए ‘परफेक्शनिस्ट’ हिट
अजय विद्युत
ajayvidyut@gmail.com

शेयरों के उतार-चढ़ाव के बारे में भले ज्यादा नहीं जानते लेकिन दर्शकों के जज्बात पढ़ना आमिर खान बखूबी जानते हैं। उनकी बनाई फिल्में चाहे लगान हो, तारे जमीन पर हो, या फिर जाने तू या जाने ना हो, सबने दर्शकों के अहसासों से नाता जोड़ा और सभी अलग और जरा हट के विषयों पर थीं। बॉक्स ऑफिस ने जमकर उत्सव मनाया। आमिर के जन्म के दिन भी पूरा देश उत्सव मना रहा था। 14 मार्च को जब पिता ताहिर हुसैन और मां जीनत के घर आमिर का जन्म हुआ, उस दिन होली थी।
ताज्जुब होता है कि शेयर मार्केट के बारे में खास जानकारी न रखने वाला बॉक्स आफिस का अर्थशास्त्र इतनी अच्छी तरह कैसे समझता है। उन्हें पता है कि जब दर्शक पैसे देकर टिकट खरीदता है तो वह क्या चाहता है। एक छोटे व्यापारी की तरह उनकी कोशिश होती है कि जिस भी व्यक्ति ने उनकी फिल्म में अपने पैसे खर्च किए हैं, उसे वह पांच गुना न सही पर दो गुना तो जरूर लौटाएं। फिल्म कारोबार के जानकारों के मुताबिक शाहरुख खान के पास 300 करोड़ रु. की संपत्ति है और आमिर के पास 60 करोड़ रु. की। इस तरह आमिर बॉलीवुड के सबसे अमीर स्टार नहीं हैं, लेकिन ज्यादातर कमर्शल हिट फिल्मों के वह स्टार हैं। पिछले तीन सालों में आर्थिक मंदी ने बॉलीवुड को इतना धक्का पहुंचाया कि तमाम फिल्में फ्लाप के गड्ढे में चली गईं। एक अनुमान के मुताबिक पिछले पांच सालों में बॉलीवुड फिल्म इंडस्ट्री हजारों करोड़ रुपए का घाटा उठा चुकी है। लेकिन बॉक्स ऑफिस के इस अर्थशास्त्री ने इस दौर में भी मुनाफा कमाया और। जिन चार फिल्मों में (गजनी, तारे जमीन पर, जाने तू या जाने ना और थ्री इडियट) उन्होंने अभिनय किया या निर्माण किया, उन्होंने बॉक्स ऑफिस पर लगभग 500 करोड़ रुपए बटोरे। पीपली लाइव भी उनकी काफी सस्ती फिल्म है जिसका बजट दस करोड़ रुपए है।

पर पैसा यूं ही नहीं बरसता। और अगर उसमें निरंतरता है तो कुछ गहरे कारण जरूर होंगे। जीनियस होने के साथ-साथ आमिर अपनी फिल्मों में किस शिद्दत से जुड़ते हैं। शुरुआती तैयारी, कहानी से लेकर उसके रिलीज होने तक जितना पसीना वह बहाते हैं, उतना कितने लोग कर पाते हैं? गजनी का किरदार हो या थ्री इडियट में 44 साल के आमिर का 20 साल के लड़के का रोल करना और उस सांचे में खरा उतरना.. यह कोई हंसी-खेल नहीं है, गहरा समर्पण है। इतना परफेक्शन कहीं और नहीं मिलता।
बॉलीवुड में आमिर का सिक्का चल रहा है। कभी अमिताभ थे। फिर शाहरुख। दरअसल ये तीनों अलग-अलग कालखण्ड का प्रतिनिधित्व करते हैं। एक दौर वह था जब ऐसी पीढ़ी भी थी जिसने तमाम सपने देखकर आजादी हासिल की थी और अपने सपनों को बिखरते देख रही थी तो वह नई पीढ़ी भी जो अन्याय के खिलाफ गुस्से से भरी थी। तभी अवतार हुआ एंग्री यंगमैन यानी अमिताभ का। लोगों के इस गुस्से को परदे पर उतारने में सलीम-जावेद की कलम और आरडी बर्मन का म्यूजिक और अमिताभ का अभिनय, तीनों की बराबर की हिस्सेदारी रही। लोगों को अमिताभ में अपनी लड़ाई लड़ने वाला गुस्सैल नौजवान दिखा। फिर आया उदारीकरण का दौर। आम आदमी की जेब में कुछ पैसा आया। उसे चमक-दमक में भरोसा आने लगा। तमाम लोगों ने पहली कार इसी दौर में खरीदी। नई पीढ़ी को चॉकलेटी इमेज वाले शाहरुख में अपना रोल मॉडल नजर आने लगा। समृद्ध होने की चेष्टा में जुटे युवाओं को अपने ख्वाबों का बादशाह मिल गया। और तीसरा दौर वह है जब मास्टर ऑफ आल की जगह परफेक्शन की दरकार हुई। कुछ अलग सोच और तरीके में लोगों का भरोसा बढ़ा। और आमिर इस दौर की डिमांड को पूरी तरह पूरा करने वाले आइकॉन बन गए।

आमिर जब खुद इतने परफेक्शनिस्ट हैं तो जिन फिल्मों से वह केवल बतौर प्रोडय़ूसर जुड़े हैं उनको डायरेक्ट करने वाले की क्या हैसियत होती होगी। पर वह एक बार प्रोजेक्ट की सारी डिटेल डिस्कस करने के बाद जब किसी को कमान सौंपते हैं तो कतई दखल नहीं देते। कभी सेट पर भी नहीं जाते। आमिर एक बार मुंबई में कहीं जा रहे थे। रास्ते में देखा किसी फिल्म की शूटिंग चल रही है। उन्हें किसी ने बताया कि उन्हीं की फिल्म ‘जाने तू या जाने ना’ की शूटिंग हो रही है। वह कार से उतरे। वहां पहुंचे। उन्होंने फिल्म के डायरेक्टर अब्बास टायरवाला और हीरो इमरान और अन्य लोगों को ‘हाय’ किया और वापस कार में बैठकर चल दिए।

फिल्म मेरे लिए महज एक व्यापार नहीं है

आमिर खान से आईबीएस-7 के प्रबंध संपादक आशुतोष की बातचीत के संपादित अंश

आमिर आपकी फिल्म ‘पीपली लाइव’ के गाने महंगाई डायन.. ने मीडिया को एक नया एक्सप्रेशन दे दिया है..

दरअसल ये महज इत्तेफाक है क्योंकि ये फिल्म तो पिछले दो साल से बना रहे हैं। वो गाना भी फिल्म में इत्तेफाक से ही आया। ओरिजनल कहानी में वो गाना नहीं है ,लेकिन फिल्म की डायरेक्टर अनुषा रिजवी जब बुडवाई में शूटिंग कर रही थीं तो वहां एक मंडली ये गाना गा रही थी, तो उनको ये गाना बड़ा पसंद आया और उन्होंने ये गाना वहां शूट किया। उस वक्त उनको अंदाजा नहीं था कि ये गाना फिल्म में कहां फिट होगा, लेकिन एडिटिंग में वो अच्छी तरह से आ गया फिल्म में। ये इत्तेफाक की बात है कि जब हम म्यूजिक रिलीज कर रहे थे तो महंगाई भी टॉपिकल चीज थी।

फिल्म महंगाई पर है?

नहीं, फिल्म महंगाई पर नहीं है हिन्दुस्तान में जैसे एक भारत है, एक इंडिया है, तो इस मुद्दे पर फिल्म है। एक समाज के तौर पर हम देश के गांवों और छोटे शहरों पर ध्यान नहीं देते हर तरीके से, लिहाजा उन जगहों पर लोगों की जिंदगी बदतर होती जा रही है। जो सुविधाएं बड़े शहरों को मिलती हैं वो वहां नहीं हैं तो सवाल है कि वहां जिंदगी कैसे चल रही है। हमारा ध्यान बिल्कुल वहां पर नहीं रहता, इससे हो ये रहा है कि गांव में जीवन कठिन से कठिन होता जा रहा है, लोग वहां से पलायन कर शहरों में आ रहे हैं। देश के तमाम गांवों में ऐसा ही है।

क्या फिल्म व्यंग्यात्मक है?

जी हां! जिस तरह ‘थ्री इडियट’ में राजू का तरीका था हास्य के साथ चीजों को बताने का, तो ‘पीपली लाइव’ में मुद्दा अहम है लेकिन तरीका व्यंग्यात्मक है।

आपके प्रोडक्शन हाउस की ये चौथी फिल्म है। लगाऩ, तारे जमीन पर, जाने तू या जाने ना और ये पीपली लाइव, आपकी चारों फिल्में अलग अलग जॉनर की हैं। आप फिल्म के विषय कैसे चुनते हैं?

एक प्रोडय़ूसर की हैसियत से मैं उसी तरह काम करता हूं जैसे एक अभिनेता के रूप में काम करता हूं। मतलब ये कि फिल्म मेरे लिए महज एक व्यापार नहीं है। जब तक मुझे कोई कहानी नहीं मिलती जो मुङो पसंद आए, मैं आगे नहीं बढ़ता। मैं आपको ये भी बता दूं कि ये चारों फिल्में अगर एक प्रोजेक्ट की तरह देखेंगे तो प्रोडय़ूसर की हैसियत से बहुत कम लोग होंगे जो इन प्रोजेक्ट्स में अपने हाथ डालेंगे क्योंकि ऊपरी तौर पर इनके विषय ऐसे हैं कि ये नहीं लगता कि ये फिल्में बहुत चलेंगी ज्यादा बिजनेस करेंगी।

आपके प्रोडक्शन हाउस की पिछली तीनों फिल्में सुपर हिट रहीं। इस फिल्म की कामयाबी को लेकर आप क्या सोचते हैं?

देखिए कामयाबी तो हमारे हाथ में है नहीं। मैं खुद ये नहीं बता पाऊंगा कि ये कैसी चलेगी।

इस फिल्म में कोई बड़ा एक्टर नहीं, कोई बड़ा स्टार नहीं है?

मुझे लगता है कि फिल्म की जो कहानी है वो इसकी स्टार है। जब मैंने ये फिल्म देखी तो फिल्म के जो एक्टर हैं, मैं मानता हूं कई नए हैं, कई जो हैं खुद गांव वाले हैं। नत्था जो है हमारा लीड एक्टर वो गांव में रहता है। इसमें बहुत से ऐसे अभिनेता हैं जिनकी ये पहली फिल्म है, लेकिन इन्हें देखकर हम स्टार्स को भूल जाएंगे।

इतना खतरा कैसे उठाते हैं आप? दूसरे की फिल्म हो तो कोई बात नहीं, पर इसमें तो आपका अपना पैसा लगा है।

दूसरे की फिल्म हो तो मुझे और फिक्र रहती है। फिल्म दूसरे की हो या अपनी, एक डर तो रहता है। रिस्की प्रोजेक्टस होते हैं, लेकिन कहीं न कहीं मुझे ये एक्साइटमेंट होता है कि मैं कुछ नया कर रहा हूं। कुछ ऐसी कहानी बना रहा हूं जो दर्शकों ने पहले नहीं देखी होगी और मैं कामयाबी के पीछे नहीं भागता जैसे, ‘थ्री इडियट’ में रैंचो कहता है कि कामयाबी के पीछे मत भागो काबलियत के पीछे दौड़ो ..शायद मैं वही कर रहा हूं।

क्या ऐसा तो नहीं है तीन लगातार हिट देने के बाद आपने सोचा हो चलो अब खतरा लिया जा सकता है?

खतरा तो सब में था। लगान में खतरा था, तारे जमीन में खतरा था। शायद मैंने ऐसी ज्यादा फिल्में की हैं जिनमें खतरा ज्यादा था, लेकिन मुझे खुशी इस बात में है कि लोगों को ये फिल्में पसंद आईं। देखिए इंडस्ट्री में कुछ लोग हैं जो अलग-अलग विचार लेकर आ रहे हैं। ये नया टैलेंट आ रहा है। आप पीपली लाइव के एक्टरों को ले लें, सारा नया टैलेंट है। मुझे लगता है कि आज मैं इस मुकाम पर हूं कि मैं उनको सपोर्ट कर सकूं। अगर मैं भी डरने लगूंगा तो नया टैलेंट कहां से आएगा।

तो क्या ये माना जाए कि अब फिल्म इंडस्ट्री में प्रयोग के लिए ज्यादा स्थान बन रहा है?

अब और बन रही है जगह, दर्शक भी बदल रहे हैं। एक समय जिन्हें फार्मूला फिल्म कहते थे वो कम कामयाब हो रही हैं.. और उसकी जगह कई अलग किस्म की फिल्में कामयाब हो रही हैं।

वो जो लाइन हुआ करती थी कि श्याम बेनेगल की फिल्म है या मनमोहन देसाई की फिल्म है, ये जो अलग अलग लाइन थीं क्या ये लाइन अब ब्लर हो रही है?

हां, वो लाइन अब ब्लर हो रही है। पिछले सालों में कई ऐसी फिल्में आई हैं जो न तो मनमोहन देसाई वाले फ्रेम में बैठती हैं न श्याम बेनेगल वाले। जैसे लगान को ले लीजिए। ये न तो मनमोहन देसाई के सांचे वाली फिल्म है, न वो श्याम बेनेगल के सांचे में फिट होती है। अपने किस्म की अलग फिल्म है। या आप तारे जमीन पर देखिए, इसको आप क्या कहेंगे, कमर्शियल कहेंगे या आर्ट कहेंगे जबकि फिल्म बहुत ज्यादा कामयाब हुई।

फिल्म आती है तो दर्शकों को रेस्पांस को लेकर धड़कनें तेज होती हैं?

हां तेज होती हैं और मैं हमेशा रोता हूं।

रोते क्यों हैं?

देखिए या तो फिल्म लोगों को पसंद आती है तो खुशी के आंसू आते हैं.. या पसंद नहीं आती है तो उदास होकर रोता हूं।

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