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दिल के डॉक्टर की नींव

डॉ. रमाकांत पांडा अड़ियल दिलों की मरम्मत करते हैं। थके-हारे और भंगार की शोभा बनने वाले दिलों को भी वे ठोक-पीट कर दुरुस्त कर देते हैं। उनकी सर्जरी टेबिल पर ठुक-पिटने के बाद दिल एक बार फिर गाना गाने लगता है-दिल धक-धक करने लगा। वैसे दिल तो दिल ही होता है। लेकिन कुछ दिल वीआईपी भी होते हैं। अपने प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह का दिल भी कुछ ऐसा ही था। प्रधानमंत्री के दिल से दो बार पहले भी छेड़छाड़ की जा चुकी है। 10 में उनकी आट्रीा की बाईपास सर्जरी हो चुकी है। इसके बाद 2003 में भी उनकी एंजियोप्लास्टी की जा चुकी है। तीसरी बार दिल को फिर दुरुस्त करना था। ऐसे में दुनिया के सबसे बेहतर दिल के डॉक्टर की खोज हुई तो डॉ. रमाकांत पांडा का नाम सामने आया। डॉ. पांडा सात सौ दिलों की रिपीट बाईपास सर्जरी कर चुके हैं। प्रधानमंत्री उनके 701वें मरीा थे। ग्यारह डॉक्टरों की टीम ने ऑल इंडिया मेडिकल इंस्टीट्यूट ऑफ सांइन्सेस (एम्स)में डॉ. पांडा के नेतृत्व में उनकी सफल सर्जरी को अंजाम दिया। डॉ. पांडा मुबंई स्थित एशियन हार्ट इंस्टीट्यूट के वाइस प्रेसीडेंट हैं। हालांकि सर्जरी की अतिविशिष्ट डिग्री एमसीएच उन्होंने एम्स से ही हासिल की है। बाद में उन्होंने फेलोशिप लेकर अमेरिका और ब्रिटेन के कई मशहूर संस्थानों में अपने कौशल को निखारा। दिल से रक्तसंचार करने वाली धमनियों (आट्रीा) की शल्य क्रिया में उन्हें महारथ हासिल है। मुबंई के बड़े अस्पतालों ब्रीच कैंडी, जसलोक, लीलावती तथा नानावटी में भी बतौर सर्जन वे अपनी सेवाएं दे चुके हैं। डॉ. पांडा पिछले तेरह साल के दौरान दस हाार बाईपास सर्जरी कर चुके हैं। विभिन्न कारणों से इनमें से 1500 हाई रिस्क सर्जरी थीं। इनमें से 700 ऐसे ऑपरशन थे, जिसमें मरीा की दोबारा हार्ट की सर्जरी की गई। ऐसा करने वाले दुनिया के वे अकेले सर्जन हैं। दोबारा हार्ट सर्जरी करने के लिये बड़े से बड़े दिल के डॉक्टर तैयार नहीं होते हैं। दोबारा कोरोनरी आट्रीा की सर्जरी बेहद जटिल होती है। लेकिन डॉ. पांडा ने ऐसे 700 मामलों को सफलतापूर्वक अंजाम देकर उन्हें नया जीवन दिया। डॉ. पांडा बेहद साधारण इंसान हैं। गरीबों की मदद करने में भी वे पीछे नहीं हटते हैं। लगभग सौ आर्थिक रूप से कमजोर मरीाों का वे मुफ्त ऑपरशन कर चुके हैं। ऐसे ही मरीाों की मदद के लिये उन्होंने एशियन हार्ट चेरिटेबल ट्रस्ट भी बनाया है। उन्होंने अपने गृहप्रदेश उड़ीसा में भी सरला मदान ट्रस्ट बनाया है। इस ट्रस्ट के जरिये वे भुवनेश्वर में दो सौ बिस्तरों का एक बड़ा अस्पताल बनाने की योजना पर काम कर रहे हैं। ट्रस्ट बीबी हाई स्कूल प्रितिपुर के पुस्तकालय को अनुदान भी देता है। दिलचस्प बात यह है कि डॉ. पांडा कभी इसी स्कूल में पढ़ने पैदल जाते थे। उनके घर से स्कूल की दूरी सोलह किलोमीटर थी। अपने जिले जाजपुर से एम्स के ऑपरशन थियेटर तक की दूरी पार करने में उन्होंने काफी संघर्ष किया। सुबह 6 बजे ही वे स्क्ूल के लिये निकल पड़ते थे ताकि बजे वे समय पर क्लास में पहुंच सकें। उनके भाई राधाकांत बताते हैं कि उस समय हमार घर से स्कूल तक सड़क नहीं थी। हमार यहां बिजली भी नहीं थे। हम लालटेन जला कर पढ़ा करते थे। डॉ. पांडा ने एससीबी मेडिकल कॉलेज से एमबीबीएस की डिग्री हासिल की है। पांडा की मां जबाकुसुम देवी ने जब यह खबर सुनी कि उनके बेटे ने प्रधानमंत्री का ऑपरशन किया है तो वे बल्लियों उछल गईं। बोली कि मेरा बेटा कभी क्लास मिस नहीं करता था। वह आज जहां भी पहुंचा है उसकी कड़ी मेहनत इसके पीछे हैं। इस मौके पर वह डॉ. पांडा के मेन्टर प्रीतिपुर हाई स्कूल के हेटमास्टर सतीश चंद्र दास को याद करना नहीं भूलीं। उन्होंने कहा कि मेर बेटे की ऊंचाई की नींव में दास बाबू खड़े हैं।

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