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जो सरकारी पैसा लेते हैं उन्हें जानकारी देनी होगी

सूचना के अधिकार का कानून काफी पहले ही लागू हो गया था, लेकिन देश में अभी लगभग दस प्रतिशत लोगों तक इस कानून की जानकारी है। जिसमें से भी मात्र दो से चार प्रतिशत लोग ही अपने इस अधिकार का प्रयोग कर रहे हैं। इस बीच ढेर सारे विवाद भी इसके साथ जुड़ गए हैं। एक तरफ इसका दायरा बढ़ाने की बात होती है तो दूसरी तरफ इसके दायरे से बाहर रहने के प्रयास भी। बावजूद इसके इस कानून से कई कामयाबियां भी मिली हैं। कानून के इन्हीं मसलों पर केन्द्रीय सूचना आयोग के कमिश्नर वजाहत हबीबुल्लाह से रू-ब-रू हुए हमारे विशेष संवाददाता गुरुचरन आयोग द्वारा जजों की सम्पति का ब्योरा मांगे जाने पर इतना बड़ा विवाद क्यों खड़ा हो गया?ड्ढr आयोग ने अभी केवल इतना ही जानना चाहा था कि कितने जजों ने अपने ब्योर दिए हैं। इस पर सुप्रीम कोर्ट दिल्ली हाईकोर्ट में चली गई। हमने अभी तो इसका ब्योरा नहीं मांगा और न जजों के नाम ही मांगे कि किस जज ने ब्योरा दिया या नहीं दिया। ई मेल से आयोग में शिकायत दर्ज कराने की सुविधा उपलब्ध कराने का रिस्पांस कैसा रहा?ड्ढr आयोग ने अपनी वेबसाइट पर ये सुविधा और इसे इस्तेमाल करने का ढंग पहले से ही उपलब्ध कराया हुआ था। खबरों में इस बात के सामने आने से ये जरूर हुआ कि काफी लोगों को इस बात पर यकीन ही नहीं हुआ। इसलिए उन्होंने बड़ी संख्या में टेस्टिगं मेल भेजीं। अनेक लोग हमें ऐसी शिकायतें भेजते हैं, जिनका आयोग से कोई ताल्लुक नहीं होता। निजी संस्थान आयोग के दायर में नहीं आते, लेकिन आयोग ने उन्हें भी नोटिस क्यों दिए?ड्ढr आयोग का मानना है कि देश के ऐसे संस्थान जो सरकार से धन व अन्य सुविधांए पाते हैं वे अपने बार में लोगों को सूचनांए अवश्य दें। क्योंकि उन्हें सरकार ने जो धन उपलब्ध कराया है, वह जनता का है। एक मामले में आयोग ने डिस्काम (दिल्ली इलैक्िट्रीसिटी रिफार्म ट्रांस्फर स्कीम) के बाबत एक फैसला दिया। डिस्काम अदालत में चला गया। सूचना के अधिकार को और आगे विस्तार देने पर आपकी क्या राय है?ड्ढr कानून में ये बात लिखी हैं कि जनता को सारी जानकारियां मिलें। यही बात अमेरिका के राष्ट्रपति ओबामा ने अपने पद को ग्रहण करते समय दिए भाषण में प्रमुखता से कही। जनता से ताल्लुक रखने वाली हर जानकारी जनता के लिए उपलब्ध रहनी चाहिए। आयोग ये मानता है कि जब सरकारी दफ्तरों में रिकार्ड रखने का प्रबंध तक ठीक नहीं है तो फिर कैसे काम आगे बढ़ेगा। आयोग ने सरकारी दफ्तरों के कामकाज पर अध्ययन के लिए उपसमिति गठित की है। जो ऐसे मामलों पर अपनी र्पिोट देगी। इसके बाद इस काम को और आगे बढ़ाया जाएगा। लोगों की शिकायत है कि आयोग की पैनल्टी की रकम कम होने की वजह से सरकारी अधिकारी पैनल्टी तो भर देते हैं, लेकिन अपने काम का तरीका नहीं बदलते। इस पर आप क्या कहेंगे?ड्ढr पहले तो पैनल्टी को सरकारी अधिकारी गंभीरता से नहीं लेते थे। आठ लाख रुपए की पैनल्टी में से जब एक लाख रुपए ही जमा हुए तो ये फैसला किया गया कि सरकारी धन की वसूली संबधित सरकारी अधिकारी के वेतन में से की जाए। यह तरीका किसी पर जुर्माना लगाने का नहीं है, बल्कि सरकार को जिम्मेदारी का अहसास कराना है। अब इस तरीके के जवाब में सीएसआईआर जसे विभागों ने अपने कामकाज का ढंग सुधार लिया है, लेकिन डीडीए और एमसीडी पर ज्यादा पैनल्टी के बावजूद खास सुधार नार नहीं आ रहा। हां, वहां अब इस पोस्ट पर कोई आने को तैयार नहीं। इस कानून का सहारा लेकर किसी को परशान करने की शिकायतें भी सामने आई हैं?ड्ढr पुलिस वाले इस मामले में जरूर शिकायतें करते रहे हैं कि सूचना के अधिकार का उपयोग करके लोग पुलिस वालों को तंग करते हैं। लेकिन तंग करने की शिकायत तो लोगों की पुलिस से रही है। आयोग का कहना है कि सरकारी अधिकारी अपने कामकाज में नियमों का पालन करंगे तो इससे उन्हें किसी बात का कभी कोई खतरा नहीं सताएगा। ज्यादा लोग इस कानून का इस्तेमाल करं, इसके लिए क्या किया जा रहा है?ड्ढr प्राइÊा वॉटर हाउस को राष्ट्रीय स्तर पर इसके अध्ययन का काम सौंपा गया है। ऐसा ही अध्ययन गैर सरकारी स्तर पर एक एनजीओ भी कर रहा है। दिल्ली और राजस्थान में इस कानून का पूरा फायदा उठाया जा रहा है, लेकिन कई जगह के बार में पता पड़ा है कि वहां कई अधिकारियों तक को नहीं पता कि उन्हें इस काम की जिम्मदारी सौंपी गई है।

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