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नियति हार गई विकलांग रिक्शे वाले से

विकलांग मदन जाटव के हौसलों से नियति हार गई। एक पैर का पंजा नहीं होने के बावजूद दमोह की सड़कों पर साइकिल रिक्शा चलाकर अपनी आजीविका चलाने वाले इस शख्स के रिक्शे में विदेशी पर्यटक भी बैठ चुके हैं। मुख्यमंत्री निवास पर रिक्शा, हाथठेला वालों की पंचायत में भाग लेने आए मदन जाटव उत्साह से बताते हैं कि कई बार विदेशियों को अपने रिक्शे में बिठाया हूं बाबूजी विदेशी पर्यटकों ने सौ रूपए तक किराया दिया है। रेलवे स्टेशन को ही अपना आसरा बनाने वाले मदन जाटव पंद्रह साल की उम्र से रिक्शा चला रहे हैं। बचपन में एक बार दमोह से कटनी जाते समय ट्रेन से गिरने से मदन अपना दाहिने पैर का पंजा गंवा बैठे। कोई और रोजगार नहीं मिला तो किराए के साइकिल रिक्शे को जीने का आधार बनाया। पंचायत में रिक्शे वालों को मालिकाना हक मिलने की उन्हें बेहद खुशी है। रिक्शा मालिक बनने का वषर्ों से अधूरा ख्वाब अब जल्द पूरा होगा और मेहनत की कमाई का बड़ा हिस्सा ठेकेदार के बजाय अब स्वयं उनके उपयोग में आएगा।

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