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मंदी में ऐश

एक जमाने में बड़े-बूढ़े यही सिखाते थे कि आमदनी अगर अठन्नी है तो खर्च को भी इसी चादर के भीतर ही समेट लेना चाहिए। आमदनी से अधिक खर्च न करने की यह पुरानी सीख अब भुला दी गई है, खासकर फाइनेंस कंपनियों के मामले में खर्च और यहां तक कि फिाूल-खर्च का आमदनी से कोई रिश्ता नहीं रह गया है। अमेरिकी राष्ट्रपति बराक ओबामा हैरान हैं कि जो कंपनियां लगातार मंदी, घाटे और डूब जाने के खतरों का रोना रोने के साथ ही सरकार से पैसे-पैसे कौड़ी-कौड़ी की मदद मांग रही हैं, वही अपने अफसरों में बोनस के नाम पर अशर्फियां लुटा रही हैं और अपने कर्मचारियों को औसतन 1,12,000 डॉलर का बोनस दे रही हैं। यह हो रहा है एक ऐसे देश में जहां औसत परिवारों की सालाना आमदनी 50 हाार डॉलर के आसपास ही है। सिर्फ इतना ही नहीं, एक कंपनी जो भारी घाटे की बात करते हुए सरकार से बेलआउट की मांग कर रही है। वह अपने अफसरों की आरामदेह यात्रा के लिए 5 करोड़ डॉलर की लागत से विमान खरीद रही है। अमेरिका में यह सवाल इसलिए भी महत्वपूर्ण है कि आम जनता की गाढ़ी कमाई से जो टैक्स वसूला गया है, उसका ही इस्तेमाल इन्हीं कंपनियों को संकट से उबारने के लिए किया जा रहा है। ओबामा ने इस तरह की शाहखर्ची को शर्मनाक कहा है। उनका तर्क है कि यह संकट, बचत और पैसे के सही इस्तेमाल का वक्त है। यह सवाल कुछ इस तरह से भी पूछा जा रहा है कि कंपनियां उन्हीं अफसरों की जेबे क्यों भर रही हैं, जिनके गलत फैसलों की वजह से मंदी का संकट इस कदर बड़ा हो गया है। इन कंपनियों का तर्क है कि अगर वे इन अफसरों को मोटी रकम नहीं देती तो खतरा यह है कि वे किसी दूसरी कंपनी में चले जाएंगे। यह तर्क भी आम लोगों के गले से नहीं उतर रहा क्योंकि मंदी के इस दौर में नौकरियां वैसे ही काफी कम हैं और घाटे में डूबी वित्तीय कंपनियों के बड़े अफसरों के लिए तो बिल्कुल ही नहीं हैं। यह कहा जा रहा है कि मंदी के बावजूद फाइनेंस कंपनियों ने अपना नजरिया नहीं बदला है। वे सरकारी मदद से संकट से पार तो पाना चाहती हैं, लेकिन अपनी रवैये को नहीं बदलना चाहती। ऐसी सोच उन्हें और शायद किसी को भी मंदी से नहीं उबरने देगी।

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  • Web Title: मंदी में ऐश