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राजरंग

दिल दिल्ली की ओर दिल कहीं लगिये नहीं रहा है। दिल तो सिर्फ दिल्ली तरफ लगल है। का होगा, नय होगा। सरकार बनेगी कि नय बनेगी? यही सोच-सोचकर मन बेचैन होवल है। एगो साहेब हैं, घड़ी छाप से जीतकर आये। बार-बार मंत्री बनते रहे। लेकिन अब पूर्व हो गये हैं। जब से पूर्व हो गये हैं तब से मन कहीं लगिये नहीं रहा है। दिल्ली दरबार से आखिरी उम्मीद है कि एक बार फिर से कुछ उलट फेर करके सरकरवा बन जाती तो फिर से चारों तरफ फिर से हरियरी दिखे लगता। एकबारगी सुखाड़ का मौसम आ गया। अभी इ मौसम नहीं आता, लेकिन गुरु हार का गये सबको फाीहत में डाल दिये। अब गुरु सरकार बनाने में ओतना इंटरस्ट भी नय देखा रहे हैं। सब मंत्री टुअर हो गया है। पूर्व कहा रहा है और जने-तने मुंह बाये घूम रहा है। लालबत्ती गयी, ठसक गया और गयी लक्ष्मी की कृपा। सबका चेहरा खिला रहता था, अब देखिये तो मुरझायल दिखता है। वही घड़ी छाप से जीतकर आये साहेब का हम हाल बता रहे थे। उनका तो दिल्ली से लेकर बंबई तक पहुंचे -पहुंच है। उ भी लगल हैं कि कइयसनों से एक बार फिर सरकार बन जाये। कुछो दिन के लिए बन जाती तो सभे ठीक हो जाता। लेकिन लगता है कि न नौ मन तेल होगा, न राधा नाचेगी।

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