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दो टूक

अनाथों-निराश्रितों का सहारा बनना भारतीय संस्कृति के उच्चादर्शो में शामिल है, पर झारखंड के कल्याण विभाग की सुस्ती देखिये कि केंद्र से कल्याण मद में मिले 17 करोड़ धर के धर रह गये। 10 महीने में खर्च हुए महा पौने छह लाख। उम्मीदों और सपनों की ऐसी हत्या झारखंड में ही संभव है। इन बुझते चिरागों के साथ पहले किस्मत ने दगाबाजी की, अब कल्याण विभाग ने भी कोई कसर नहीं छोड़ी। विभाग को एनजीओ का चयन कर योजनाओं को अमलीजामा पहनाना था, पर वह कुंभकर्णी निद्रा में सोया रहा। अनाथों को उम्मीद थी कि उन्हें रोजगारोन्मुख प्रशिक्षण मिलेगा, तो हुनर की बदौलत वे अपना भविष्य संवार लेंगे। पर, धन और संसाधन की उपलब्धता के बावजूद विभाग ने इनका भविष्य पंगु बना दिया है। इस अकल्याण का दायित्व कौन लेगा, यह अहम सवाल है। ं

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