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दिल्ली की सड़कों पर जाम ही जाम

सम्मान बनावे काम सामाजिक कार्यकर्ता को हम नेता जी, कह कर पुकारते हैं। जल्दी बारी आने के लिए हम कम्पाउंडर को ‘डॉक्टर’ साहब कह देते हैं। दाम घटाने के लिए हम राज-मिस्त्री को ‘ठेकेदार’ कहते हैं। काम करवाने के लिए हम सफाई कर्मचारियों के हेड को ‘इंस्पेक्टर’ कह कर पुकारते हैं। बस चालक व मकेनिक को उस्ताद जी कहते हैं। संस्था या वेलफेयर सोसाइटी के अध्यक्ष को ‘प्रधान जी’ कहते हैं। इनके अतिरिक्त पंडित जी, ज्ञानी जी, खलीफा जी, गुरु जी, सेठ जी इत्यादि। और हमारा काम बन जाता है। राजेन्द्र कुमार सिंह, रोहिणी, दिल्ली यह कैसा तकनीकी विकास विज्ञान की तरक्की से सब चकित हैं पर आतंकवादी इन्हीं नए साधनों का इस्तेमाल करके घातक हमलों को अंजाम देते हैं और हम सिर्फ देखते ही रह जाते हैं। इंटरनेट के माध्यम से आतंकी गतिविधियां चलती रहती हैं और हम बेखबर रहते हैं। सुप्रीति रानी, चंडीगढ़ ये हिन्दुस्तानी तालिबानी तालिबान शब्द अपने आप में ही आतंक शब्द का पर्याय बन चुका है। माना कि विदेशी तालिबानों को काबू करना भारत के लिए कठिन हो सकता है पर अपने तालिबानियों पर तो यहां की सरकारं शिकांा कस ही सकती हैं। ये भारतीय तालिबानी विभिन्न सेना के नाम पर रौब दिखाते हैं। ऐसे असमाजिक तत्वों को कठोरतम सजा दी जानी चाहिए। इन्द्र सिंह धिगान, किंगवे कैम्प, दिल्ली पद्मश्री और फिल्मी हस्तियां अभी हाल में जिन बॉलीवुड स्टारों को पद्मश्री पुरस्कार के लिए नामांकित किया गया है यह किसी हास्यास्पद घटना से कम नहीं है। यह समझ में नहीं आया कि उन्होंने ऐसा कौन सा उल्लेखनीय कार्य किया है, जिसके लिए उन्हें चुना गया? यह दुर्भाग्य की बात है कि जो लोग इसके सही हकदार होते हैं, वह इससे वंचित रह जाते हैं क्योंकि उन व्यक्ितयों की पहुंच उच्च पदों पर आसीन नेताओं या अधिकारियों से नहीं होती है। भारत जसे लोकतांत्रिक देश में यह ठीक नहीं है। बृजमोहन सिंह रावत, बुराड़ी, नई दिल्ली

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