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शिक्षा की दुनिया में हैसियत के लिए

भारत ने एक औसत गुणवत्ता वाला उच्च शिक्षा तंत्र बहुत दिन तक बर्दाश्त किया है। अब भारत एक वैश्विक अर्थव्यवस्था में प्रतिस्पर्धा करना चाहता है इसलिए अब हमें अत्यंत कुशल पेशेवर लोगों की जरूरत पड़ेगी। ऐसे में उच्च शिक्षा का स्तर बहुत महत्वपूर्ण हो जाता है।

मुख्य मुद्दा यह है कि अच्छी शिक्षा के लिए सिर्फ ज्यादा पैसा और बेहतर नियमन ही काफी नहीं है, हमें कुछ बुनियादी बातों पर फिर से सोचना पड़ेगा जैसे शिक्षा किसे और कैसे दी जानी है। भारतीय उच्च शिक्षा क्षेत्र कई समस्याओं से घिरा हुआ है जिनमें नीतिगत कमियां, कार्यान्वयन की दिक्कतें, पूर्ति का संकट और गुणवत्ता की समस्या प्रमुख है। पिछले दिनों सुधारों के लिए जो पहल की गई उसके बावजूद उच्च शिक्षा क्षेत्र में कई चुनौतियां बाकी हैं।

सबसे पहले शिक्षक - इनकी संख्या और गुणवत्ता दोनों ही उच्च शिक्षा के रास्ते में बड़े बाधक हैं। न केवल हमारे यहां शिक्षकों की कमी है बल्कि सबसे ज्यादा कमी वहां है जहां इनकी सबसे ज्यादा जरुरत है अर्थात स्कूली शिक्षा में।

नए स्कूल, नए साधन और नए प्रोत्साहन नाकाफी हैं जब तक कि हमारे पास शिक्षा का बुनियादी काम करने के लिए नए शिक्षक नहीं होंगे। शिक्षकों की ट्रेनिंग को बढ़ाकर इस समस्या को हल नहीं किया जा सकता जब तक कि शिक्षा के तरीके में कुछ नया नहीं किया जाता।

भारत में हर स्तर पर शिक्षकों की कमी है और ऐसा कई साल से है। हमारे यहां के श्रेष्ठ शिक्षा संस्थान इससे सबसे ज्यादा प्रभावित हुए हैं। लेकिन बड़े पैमाने पर इस कमी को भरने के लिए कोई निश्चित समय सीमा, देखरेख और जवाबदेही नहीं है।

मिसाल के तौर पर केन्द्रीय विश्वविद्यालयों में 3761 पद खाली हैं, केन्द्र सरकार की देखरेख में चल रहे विश्वविद्यालयों में 4364 पद खाली हैं, पुराने सात आईआईटी में 2009-10 में 1065 पद खाली हैं, सात आईआईएम में कम से कम 100 पद हर संस्थान में  खाली हैं, विश्वविद्यालय अनुदान आयोग के 2008 में किए गए 47 विश्वविद्यालयों के सर्वेक्षण में 51 प्रतिशत तक पद खाली पाए गए।

दूसरे गुणवत्ता के मामले में भी काफी कमी है। भारत में विश्वविद्यालयों में पढ़ाने के लिए पर्याप्त पीएचडी धारक नहीं हैं। इसकी वजह से शिक्षकों की गुणवत्ता भी घटती जा रही है और इसका भारत की बौद्धिक श्रेष्ठता पर भी असर पड़ेगा। उच्च शिक्षा के विस्तार और गुणवत्ता को बढ़ाने में सबसे बड़ी दिक्कत पीएचडी धारकों की कमी है। 

2007-08 में भारत में लगभग 156 शोधकर्मी प्रति 10 लाख जनसंख्या पर थे। इसके मुकाबले अमेरिका में यह संख्या 4700 प्रति 10 लाख है। स्नातकों की गुणवत्ता उनके शिक्षकों की गुणवत्ता पर निर्भर करती है। भारत में इंजीनियरिंग और टेक्नालॉजी शिक्षा में शिक्षकों की बेहद कमी है।

दूसरे आकर्षक और फायदेमंद क्षेत्रों की ओर आकर्षण इस समस्या को बढ़ा रहा है। भारत में विज्ञान और इंजीनियरिंग में हर साल पांच हजार से भी कम पीएचडी निकलते हैं जबकि अमेरिका में यह संख्या लगभग 23 हजार और चीन में 35 हजार है।

तीसरा मुद्दा पूर्ति के क्षेत्र की कमियां हैं। जापान में जहां 13 करोड़ जनसंख्या के लिए 4000 विश्वविद्यालय हैं और अमेरिका में 31 करोड़ लोगों के लिए 3500 विश्वविद्यालय हैं वहीं भारत में 120 करोड़ जनसंख्या के लिए सिर्फ लगभग 400 विश्वविद्यालय हैं। इससे उच्च शिक्षा के क्षेत्र में काफी बड़ी मांग और पूर्ति की खाई पैदा हो गई है। उदाहरणार्थ 2009 में आईआईटी प्रवेश परीक्षा में 3 लाख 85 हजार छात्र बैठे लेकिन सिर्फ 10 हजार को प्रवेश मिला।

यही हालत अखिल भारतीय इंजीनियरिंग प्रवेश परीक्षा की है। इसी तरह कैट की परीक्षा में बैठे 4 लाख छात्रों में से सिर्फ 1500 को आईआईएम में प्रवेश मिला। अवसरों की इस कमी की वजह से भारत में कम कुशल श्रमिकों की बहुत बड़ी तादाद है। उदाहरणार्थ भारत में फिलहाल सिर्फ 6 से 8 प्रतिशत तक कुशल श्रमिक हैं जबकि यह संख्या विकसित या आगे बढ़ती हुई अर्थव्यवस्थाओं में 60 प्रतिशत तक है।

चौथा मुद्दा शिक्षा में अपर्याप्त निवेश का है। भारत में जीडीपी का 4 प्रतिशत शिक्षा में लगाया जाता है और इसमें से 0.6 प्रतिशत उच्च शिक्षा में जाता है। इसकी वजह से यूनेस्को ने भारत को प्रति छात्र सबसे कम खर्च करने वाले देशों में रखा है। जहां तक उच्च शिक्षा पर सरकारी खर्च का सवाल है चीन, रूस और ब्राजील क्रमश: 2728 डॉलर, 1024 डॉलर और 3986 डॉलर प्रति छात्र खर्च करते हैं जबकि भारत में यह आंकड़ा सिर्फ 400 डॉलर है। 

इस कमी को भरने के लिए निजी और सरकारी क्षेत्र की भागीदारी (पीपीपी) के मॉंडल को प्राथमिकता के स्तर पर लागू किया जाना चाहिए। इसके अलावा विदेश शिक्षा संस्थानों को लाने के लिए जरूरी नियामक ढांचा बनाया जाना चाहिए।

पांचवां मुद्दा नियमन का है। भारत में उच्च शिक्षा के क्षेत्र में शैक्षणिक सुधारों की धीमी गति काफी हद तक ज्यादातर संस्थानों में शैक्षणिक ढांचे और तौर-तरीकों में लचीलेपन की कमी की वजह से है। ज्यादातर संस्थाएं पढ़ाने, परीक्षा लेने आदि में बहुत पुराने तरीकों को इस्तेमाल करती हैं।

फिलहाल भारत के 400 से ज्यादा विश्वविद्यालयों में से सिर्फ एक तिहाई और 20000 कालेजों में से सिर्फ 1/5 कालेज राष्ट्रीय आकलन और मान्यता परिषद (एनएएसी) के द्वारा मान्यता प्राप्त हैं क्योंकि यह एक स्वैच्छिक जरूरत है।

कुछ मान्यता प्राप्त संस्थान ऐसे हैं जिनकी पांच वर्षीय मान्यता खत्म हो चुकी है,वे मान्यता का दावा नहीं कर सकते। इसके अलावा कई सारे नियामकों की मौजूदगी उच्च शिक्षा के लिए एक बड़ी चुनौती है। यूजीसी, एमसीआई और बीसीआई जैसे नियामकों की जगह एक नियामक बनाने का प्रस्ताव इस समस्या को हल कर सकता है।

हमें इन समस्याओं को हल करने के लिए कुछ कल्पनाशील और अचूक निदान ढूंढ़ने होंगे। ये सारी ही चुनौतियां शिक्षकों के प्रशिक्षण और प्रबंधन से जुड़ी हैं। इसे बदलना संभवत: सबसे ज्यादा कठिन है। लेकिन अब हम इसकी उपेक्षा करना गवारा नहीं कर सकते। यह साफ है कि परंपरागत तरीकों से इन चुनौतियों से नहीं निपटा जा सकता। कुछ नए तरीके ये हो सकते हैं-

पहला, शिक्षकों के प्रशिक्षण में तेजी से सुधार और विस्तार। इसके लिए प्रतिष्ठित विदेशी शिक्षक प्रशिक्षण संस्थानों से भागीदारी जरूरी हो सकती है ताकि इस विस्तार में गुणवत्ता का नुकसान न हो। दूसरा, शिक्षकों की उत्पादकता बढ़ाने के लिए दूरस्थ शिक्षण और नई टेक्नालॉजी का सहारा लेना चाहिए। तीसरा, हमें ऐसे तरीके ढूंढ़ने होंगे जिससे इस तंत्र में शिक्षकों के करियर का बेहतर प्रबंधन हो। इसके लिए उनकी क्षमता बढ़ाने के लिए प्रोत्साहन जरूरी होगा। इसके अलावा हमें शिक्षकों को आकर्षित करने और बनाए रखने के लिए आर्थिक और दूसरे किस्म के प्रोत्साहनों के बारे में सोचना होगा।

लेखक राज्यसभा सदस्य और पूर्व केंद्रीय सचिव हैं

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