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पिया घर आया

कुछ पुरानी विरहनों ने मुझे बताया कि जो पिया नौ महीने बाद घर लौटता है उसके लिए ललनाओं के हृदय में मिलन की उत्तेजना के साथ-साथ वात्सल्य भी छलकता है, मानों पिया अभी-अभी फिर से जन्मा हो। ऐसे में पिया अगर उम्र दराज हो तो थोड़ा शर्माता है और बार-बार जिन्ना की कसम खाता है कि पड़ोसी के यहां बिरियानी खाने के बाद घर लौटना ऐसा लगता है जैसे जवानी लौट आई हो।

बूढ़ी पत्नी षोडसी प्रेमिका में बदल गई हो। नदियां अपने मायके लौट आई हों। खैर घरवालों को भी पता है कि लापता हुए या धकियाए गए पिया की वापसी की मजबूरी एक तरह की श्मसान पूजा है। जहां राजनीति की अघोरन अपने दलीय स्वार्थो की कपालक्रिया करती है। घर और घर लौटनेवाले पिया दोनों को अपनी-अपनी मजबूरियां पता रहती हैं। दोनों के चेहरे पर सनसनी जैसी मुस्कान रहती है। दोनों तरफ है आग बराबर लगी हुई। दोनों को पता है कि ससुर ये आग लगाई किसने है।

हमारे यहां पहाड़ी पिया घर कम आते थे मनीआर्डर ज्यादा भेजते थे। दैनिक पिया रोज शाम को टुन्न होकर घर लौटते और पत्नी के साथ पहले दलित फिर स्त्री-विमर्ष करने लगते। आषाढ़ व सावन में जिस प्रिया को विरह नहीं सताता वो समझो दिल्ली के साहित्यकार की गांव में छोड़ी पहली पत्नी है। जिसने कभी संयोग नहीं देखा उसे वियोग की पीड़ा नहीं सता पाती।

राजनीति में घर वापसी स्वार्थ साधने की वापसी है। कुछ राजनैतिक पतिव्रताएं इसी डिप्रेशन में तीन बार खाती थीं सो तीन बेर खाती हैं कि पति मरे तो सती होयं। सबको पता है कि नौ महीनों बाद पिया यूं ही नहीं लौटता। जिन्ना की कसम हो या हार्दिक रूप से खिन्ना की मजबूरी। जिन्ना और खिन्ना के बाद तो तुक सिर्फ मतिर्भिन्ना का बनता है। यानी जैसे मतिर्भिन्ना वैसे पतिर्भिन्ना।

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