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कहने और करने का फर्क

उनके बॉस जब भी टीम के साथ होते तो कहना नहीं भूलते थे कि बी करेजियस। फिर जैसे उसे दोहरा रहे हों कि हिम्मत चाहिए। कुछ भी करने के लिए हिम्मत। हिम्मती बनो और कामयाबी तुम्हें मिल कर रहेगी। टीम चुपचाप सुनती रहती और उनके जाने के बाद चकल्लस करती रही।

मलेन के सीसीओ एडवर्ड बोचिज का कहना है कि हम जो भी टीम से कहते हैं, उसके पीछे पूरी ईमानदारी होनी चाहिए। लीडर के लिए जरूरी है कि वह अपनी बात पर टिके। अगर ऐसा नहीं होगा, तो टीम वर्क पर असर पड़ेगा।

अक्सर होता यह है कि टीम लीडर बड़ी-बड़ी बातें कर देते हैं। ऐसे हिम्मती बनो, वैसे हिम्मती बनो। अपने फैसले खुद लो। जोखिम लेने से मत झिझको। लेकिन कोई हिम्मत दिखा देता है, तो चीजें बिगड़ जाती हैं। कोई बिना पूछे कोई फैसला कर ले, तो हाय तौबा हो जाती है। फिर आमतौर पर जोखिम लेने का मतलब होता है कि बॉस साथ छोड़ देता है। अपने साथी को अकेला छोड़ देता है।

एक जगह हिम्मत दिखाने की जब वह कीमत चुकाता है, तो अगली बार कोई दुस्साहस नहीं करता। आप लीडर हों या टीम के सीनियर-जूनियर साथी। एक ईमानदारी तो आपके भीतर होनी चाहिए। वह होगी तो आप जो भी कहेंगे, उसका मतलब होगा। वह दूसरों पर ही नहीं, आप पर भी लागू होगा।

दरअसल, जब लीडर के कहने और करने में कोई फर्क नहीं होता, तब टीम बात मानती है। टीम जानती है कि बॉस पीछे खड़ा है। अगर काम करते हुए कोई गड़बड़ हो भी गई तो वह संभाल लेगा। हिम्मत करने को कहा है, तो खुद भी हिम्मती होगा। अपने फैसले लेने को कहा है, तो खुद भी फैसले लेगा। हम कहीं लीडर होते हैं, तो कहीं टीम के हिस्से। असल बात यह है कि हमारे कहने और करने में कोई फर्क न हो।

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