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शहर की धाक

अगर योजना हो, संसाधन हों और उसे लागू करने का जज्बा हो तो क्या नहीं हो सकता। किसी को इसे देखना हो तो वह दिल्ली को आकर देखे। दस साल पहले गाड़ियों के प्रदूषण, झुग्गी झोपड़ियों की गंदगी, डीटीसी बसों में ठसमठस करती और रिहायशी इलाकों के कारखानों से हांफती और नाक-भौं सिकोड़ती दिल्ली आज अगर खुली हवा में सांस ले रही है और मेट्रो की स्पीड से चल रही है तो यह सचमुच गर्व की बात है।

हालांकि बढ़ती आबादी और ऊंचे सपनों के कारण इसे दिल्लीवासी भले कम मानते हों पर दुनिया मान रही है और वाहवाही कर रही है। यही वजह है कि सिंगापुर के वर्ल्ड सिटी समिट में दिल्ली को दुनिया के चार बेहतरीन शहरों में शामिल किया गया है।

प्राइज पाने के लिए जो कारण गिनाए गए हैं उनमें दिल्ली के रहन सहन का स्तर, लगातार बढ़ती हरियाली और साफ-सफाई प्रमुख हैं। सचमुच अगर 1997 के बाद से अब तक दिल्ली का हरित क्षेत्र 26 वर्ग किलोमीटर से बढ़कर 300 वर्ग किलोमीटर हो गया है तो यह एक चमत्कार है और इसके लिए दिल्ली की मुख्यमंत्री शीला दीक्षित की तारीफ उचित ही है।

दिल्ली सरकार अपनी इस उपलब्धि के लिए अगर सभी सार्वजनिक वाहनों में सीएनजी ईंधन लागू करने को जो श्रेय देती है तो वह जायज है। लेकिन यह उपलब्धियां न तो इन्हीं स्थितियों में ठहरनी चाहिए न ही इसी शहर तक रुकनी चाहिए। दिल्ली को सजाने के प्रयास स्वागत योग्य हैं लेकिन अन्य राज्यों के शहरों की तरफ भी ध्यान दिया जाना चाहिए।

एक बड़ी आबादी शहरों की तरफ आ रही है और शहरों के पास उन्हें अंटाने की कोई योजना नहीं है। इसलिए जरूरी है कि शहरी नियोजन के लिए राष्ट्रीय स्तर पर चिंतन हो और नीति बने। वर्ना हम अपने भविष्य को अनिश्चय के गर्त में ढकेलेंगे।

इसे रोक पाना तभी संभव है जब देश में बेहतर जीवन जीने और बाकी लोगों को भी बेहतर जीवन देने का सपना और उसे पूरा करने का संकल्प हो। अपने साथ दूसरे के लिए भी बेहतर स्थितियां बनाने का यही सपना एक नई संस्कृति को जन्म देता है जिसमें शहर एक भेड़ियाधसान के बजाय कुशलता और अनुशासनप्रियता का पर्याय बन जाता है।
   
आज अगर दिल्ली बेहतर बन रही है और सज-धज रही है तो इसके पीछे सरकार की योजनाएं ही नहीं सुप्रीम कोर्ट के हस्तक्षेप का भी योगदान है। लेकिन दिल्ली को बेहतर बनाने में सबसे बड़े इंजन की भूमिका निभा रहा है कामनवेल्थ खेलों का आयोजन। यही इंजन देश के दूसरे शहरों को मिले यह जरूरी नहीं। उन्हें अपने-अपने इंजन तलाशने होंगे।

भारत में यह काम उस तानाशाही तरीके से नहीं हो सकता जैसा ओलंपिक आयोजन के दौरान बीजिंग को सजाने के लिए किया गया। बीजिंग में तो बेहद क्रूर ढंग से न सिर्फ पुरानी इमारतों को तोड़ दिया गया बल्कि वहां के सामान्य नागरिकों के साथ बहुत खराब सुलूक किया गया। उसकी तुलना हिटलर के जमाने में बर्लिन में हुए ओलंपिक आयोजन से भी की गई थी।

उससे अलग भारत में शहरीकरण लोकतांत्रिक ढंग से ही होगा और उसी ढंग से यह सुंदर और बेहतर भी बनेगा। यह प्रक्रिया धीमी है और कहीं-कहीं अराजक भी है इसीलिए इसमें खीझ भी होती है। लेकिन यह मानवीय है इसलिए सराहनीय है। बस जरूरत इसे चलाने की इच्छाशक्ति और अनुशासन का संकल्प लेने के साथ एक राष्ट्रीय नीति बनाने की है।

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