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जीत चुनो

जीवन में अकसर ऐसा होता है जब हम परिस्थतियों से हार कर काम को बीच में ही अधूरा छोड़ देते हैं। हताशा इतने चरम पर पहुंच जाती है कि काम बेहद मुश्किल लगता है और प्रतीत होता है कि जैसे सारी संभावनाएं खत्म हो गई हैं। परिस्थतियां कुछ ऐसी बन जाती हैं कि आप जिस काम में भी हाथ डालते हैं, परिणाम नकारात्मक ही आता है।

अब प्रश्न यह है कि जब स्थितियां प्रतिकूल हों, तो क्या करना चाहिए? सामान्यत: ऐसे मुश्किल वक्त में लोग हौसला हार जाते हैं, पर ऐसी परिस्थतियों का सामना हमेशा डटकर करना चाहिए। ध्यान रखें कि सफलता मैदान छोड़कर जाने वालों को नहीं, बल्कि अंतिम समय तक संघर्ष करने वालों को मिलती है।

विजेता कभी रणभूमि में पीठ नहीं दिखाते और पीठ दिखाने वालों के हिस्से कभी जीत हासिल नहीं होती। तब तक हिम्मत न हारिए जब तक लक्ष्य हासिल न हो जाए। लेकिन कभी-कभी हालात ऐसे बन जाते हैं कि निराशा के ये बादल छंटने का नाम नहीं लेत। ऐसे दौर में कुछ बातों को ध्यान रखना जरूरी होता है-

प्रोत्साहित करें खुद को: आप अपने लक्ष्य को हासिल करने के बाद कैसा महसूस करते हैं? जाहिर है अपने मिशन को पूरा करने के बाद खुशी ही होगी। मिशन को फतेह करने की यह खुशी, उस मिशन के दौरान आई मुश्किलों के जख्मों को भर देती है।

हताशा और निराशा के दौर में खुद को प्रोत्साहित करें, अपने लक्ष्य को तय करें और अर्जुन की आंख की तरह उस पर निशाना साधे रखें, पर विजेता बनने के लिए राह में आने वाली मुश्किलों के लिए कोई शॉर्टकट न अपनाएं। अपनी कोर वैल्यू, लक्ष्य और अपेक्षाओं का सामंजस्य बिठाकर ही काम को अंजाम दें।

किसी प्रतियोगिता में भाग लें, पर विजेता के लिए कोई पुरस्कार न हो, तो जाहिर है कि यह थोड़ी निराशा तो देगा ही। बिल्कुल ऐसा ही आपकी निजी जिंदगी में भी लागू होता है। अपने लक्ष्य को पा लेने के बाद खुद को पुरस्कार दें। अपने उद्देश्य की पूर्ति होने पर खुद के लिए पुरस्कार निश्चित कर लें। मसलन, किसी छोटे काम के पूर्ण होने पर रेस्तरां में पार्टी, तो बड़े काम के पूर्ण होने पर किसी लंबी छुट्टी पर घूमने के लिए जाएं।

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