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मानसून की देरी खरीफ फसलों को करेगी प्रभावित

उत्तर प्रदेश में मानसून पहुंचने में करीब 15 दिन का विलंब हो चुका है लेकिन अगले आठ से 10 दिनों की देरी राज्य में खरीफ फसल की पैदावार पर बुरा प्रभाव डाल सकती है।

सामान्य तौर पर उत्तर प्रदेश में मानसून 15 जून तक पहुंच जाता है। कृषि विशेषज्ञ के.बी.त्रिवेदी ने कहा कि मई के आखिर और जून के पहले सप्ताह में बोई गई लगभग 30-40 दिन पुरानी धान की पौध को इस समय प्रचुर सिंचाई की जरूरत है। अगर अगले 10 दिन में मानसून नहीं आया और बारिश नहीं हुई तो धान की रोपाई पर इसका प्रभाव पड़ेगा।

उन्होंने कहा कि किसानों ने कुछ स्थानों पर ट्यूबवेल से सिंचाई करके धान की रोपाई शुरू कर दी है, लेकिन प्रदेश के ज्यादातर खेतों की सिंचाई वर्षा पर निर्भर है। कृषि विभाग ने इस साल वर्ष 2009 मेंखरीफ बुवाई के 70 लाख हेक्टेयर के सापेक्ष 85 लाख हेक्टेयर का लक्ष्य रखा है।

कृषि विभाग के निदेशक जे.पी.त्रिपाठी का कहना है कि फिलहाल चिंता की कोई बात नहीं है। हमारे पास सिंचाई के पर्याप्त साधन मौजूद हैं। राज्य की 60 फीसदी से अधिक सिंचाई नहरों और ट्यूबवेलों से होती है।

उन्होंने कहा कि आगामी 10 जुलाई तक मानसून नहीं आया तो धान की रोपाई पर प्रतिकूल असर पड़ेगा। क्योंकि धान ऐसी फसल है जिसे पानी की ज्यादा जरूरत होती है। इसका पौधा रोपाई के वक्त से लेकर आगे लंबे समय तक पानी में डूबा रहना चाहिए। ऐसे में बिना बारिश के केवल ट्यूबवेल और नहरों से जरूरत के मुताबिक सिंचाई कर पाना थोड़ा कठिन है।

इस साल धान की रोपाई का लक्ष्य पिछले साल के 51 लाख हेक्टेयर के मुकाबले 60 लाख हेक्टेयर रखा गया है। कृषि विशेषज्ञों का कहना है कि मानसून के देरी का असर धान के अलावा खरीफ की दूसरी फसलों पर भी देखने को मिलेगा।

इस साल दलहन का बुआई का लक्ष्य पिछले साल के 3.95 लाख टेक्टेयर के सापेक्ष 4.10 लाख हेक्टेयर रखा गया है। ज्वार का बुआई का लक्ष्य 3.23 लाख हेक्टेयर, बाजरा 8.5 लाख हेक्टेयर और मक्का का बुवाई क्षेत्र नौ लाख हेक्टेयर तय किया गया है।

कृषि विशेषज्ञ आर.एस.राठौर कहते हैं कि मानसून न आने से इन फसलों की बुआई पिछड़ती जा रही है। उन्होंने कहा कि बारिश न होने से नहरों में प्रचुर पानी नहीं है और डीजल के दामों में बढ़ोत्तरी होने से ट्यूबवेल कि सिंचाई इतनी महंगी हो गई है कि गरीब किसान के पास बारिश के पानी का ही सहारा है।

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