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सब्र का बांध

किताबों में सब्र का फल मीठा होता है, लेकिन लोकतंत्र की राजनीति यही कहती है कि बहुत ज्यादा सब्र से कुछ हासिल नहीं होता। जब इसका बांध टूटता है, तभी लोग कुछ हासिल कर पाते हैं। मुंबई के बोरीवली स्टेशन में जो हुआ वह एक छोटी सी घटना थी, लेकिन उसके निहितार्थ काफी बड़े हैं। शाम को जिस वक्त स्टेशन पर सबसे ज्यादा भीड़ होती है, दिन भर की थकान के बाद लोगों को घर पहुंचने की जल्दी होती है। किसी तकनीकी खामी की वजह से कुछ ट्रेनें लेट हो गईं और लोगों के सब्र का बांध अचानक ही टूट पड़ा। गुस्से से भर लगभग पचास हाार यात्री ट्रेन की पटरियों पर उतर गए और सारा ट्रैफिक रोक दिया। इन लोगों का कोई नेता नहीं था, उन्हें किसी ने भड़काया नहीं था। समान तकलीफों ने उन्हें एकाुट किया और उनकी छोटी छोटी आवाजें मिलकर एक दहाड़ में बदल गईं। हम यहां भीड़ की किसी मानसिकता का महिमामंडन नहीं कर रहे। बात सिर्फ इतनी है कि जसी तकलीफ बोरीवली स्टेशन के इन यात्रियों को हुई, वैसी तकलीफों से हर शहर, हर कस्बे और हर गांव के लोगों को दो-चार होना पड़ता है। कहीं लोगों को पीने का पानी नहीं मिलता, कहीं बिजली नहीं आती और कहीं स्वास्थ्य केंद्रों में डॉक्टर मौजूद नहीं रहते। समस्याओं के कारण हो सकते हैं लेकिन उनके तुरंत और समय रहते समाधान की कोई व्यवस्था बनाना हमारी सरकारों की प्राथमिकता सूची में नहीं है। यह कब तक चल सकता है कि जो लोग अपनी दिन रात की मेहनत से देश को दस फीसदी विकास दर तक ले गए हों, वे जीवन की मूलभूत सुविधाओं के लिए तरसते और परशान होते रहें। लोगों की मुश्किलें समय रहते खत्म हो सकेंगी इसकी कोई उम्मीद भी हमारी व्यवस्था नहीं देती। हम लगातार अपने शहरों को विस्तार देते जा रहे हैं, लेकिन वहां जीवन के लिए जरूरी इन्फ्रास्ट्रक्चर अव्वल तो बनाया ही नहीं गया है, और जहां वह बनाया गया है, वहां उसे सुचारु रूप से चलाने का कोई पुख्ता इंतजाम नहीं है। बोरीवली की घटना में चेतावनी भी है। वहां भीड़ भले ही बड़ी थी, लेकिन थोड़ी सी परशानी खड़ी करने के बाद चली गई। कल को यह भीड़ हिंसक भी हो सकती है और अंजाम अप्रिय। लोगों की दैनिक जरूरतों के समाधान की पुख्ता संस्थागत व्यवस्था से ही इन चीजों से बचा जा सकता है।

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  • Web Title: सब्र का बांध