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मिलीबैंड की खता से मिला फायदा

भारतीय लॉबिंग कामयाब रही। उसने यह सुनिश्चित कर लिया कि रिचर्ड होलब्रुक के कामकाज के दायरे में भारत या कश्मीर नहीं रहेंगे। भारत ने जब ओबामा प्रशासन को हालात की गंभीरता बताई तो हिलेरी क्िलंटन ने होलब्रुक को अफगानिस्तान और पाकिस्तान के लिए विशेष प्रतिनिधि नियुक्त किया। भारत होलब्रुक के मिशन को लेकर इतना चिंतित था कि उसने ओबामा प्रशासन से दो टूक कह दिया था कि उनके दायरे में भारत या कश्मीर शामिल हुए तो भारत उन्हें कोई अहमियत नहीं देगा। ओबामा प्रशासन को यह समझ में आ गया कि अगर ऐसा हुआ तो उनका कार्यकाल शुरू होते ही एक राजनयिक समस्या खड़ी हो जाएगी, इसलिए वह मान गया। हालांकि इसका यह अर्थ भी नहीं है कि कश्मीर का मसला एजेंडे से बाहर चला गया है, लेकिन इससे यह तो पता पड़ता ही है कि इस मसले पर पश्चिमी ताकतों की क्या सीमाएं हैं। खासतौर पर जब हम इसे ब्रिटिश विदेश सचिव डेविड मिलीबैंड की पिछले दिनों हुई भारत यात्रा से जोड॥कर देखते हैं। इस यात्रा के दौरान मिलीबैंड ने न सिर्फ यह दिखाया कि उन्हें इस क्षेत्रीय मसले की ज्यादा जानकारी नहीं है, बल्कि ब्रिटेन की भारत में साख को भी नुकसान पहुंचाया। उन्होंने जब यह कहा कि दक्षिण एशिया की समस्या को खत्म करने के लिए जरूरी है कि कश्मीर की समस्या को निपटाया जाए तो अपने उथलेपन को भी जाहिर कर दिया। वे ब्रिटेन के आला राजनयिक हैं, इस लिहाज से ब्रिटिश विदेश नीति पर भी सवाल खड़े हो गए। यह ठीक है कि भारतीयों की इस पर प्रतिक्रिया कुछ ज्यादा ही तीखी थी, लेकिन यह भी उतना ही बड़ा सच है कि इस मसले पर पश्चिमी ताकतों को भारत की संवेदनशीलता का जरा भी ख्याल नहीं है। यही गलती ओबामा ने की थी, जब उन्होंने कहा था कि अफगानिस्तान में अमेरिका की कामयाबी कश्मीर मसले पर उसकी सक्रियता पर निर्भर करगी। लगता है मिलीबैंड ने इसी से समझ लिया कि हवा बदल रही है। भारत अमेरिका की 11 सितंबर की घटना या लंदन सबवे के बम विस्फोट से कहीं पहले से आतंकवाद का शिकार रहा है। इस्लामी उग्रवाद ने जब हडसन और टेम्स को छुआ, उससे कहीं पहले से यह भारत की नाक में लगातार दम कर रहा है। पश्चिम ने अफगानिस्तान से सोवियत सेनाओं को खदेड़ने के लिए मुजाहिद्दीन की मदद की थी। और सोवियत सेनाओं के वापसी के बाद पश्चिम ने भी उसे अपने हाल पर छोड़ दिया। इसके बाद अफगानिस्तान को जो तालिबानीकरण हुआ और पकिस्तान का इस्लामीकरण हुआ उसका सबसे ज्यादा नुकसान भारत को ही झेलना पड़ा है। तबसे अब तक सीमापार का आतंकवाद भारत को परशान कर रहा है। तबसे यह लगातार भयानक होता जा रहा है। कश्मीर समस्या पूर परिदृश्य का एक छोटा सा हिस्सा है और वहां हुए पिछले दो सफल चुनाव में लोगों की भारी भागीदारी के बाद इसमें मुंबई हमले का कोई तर्क नहीं निकलता। न ही यह ऐसा कारण है, जिससे पश्चिमी ताकतें अफगानिस्तान में हार रही हैं। मुंबई हमले को कश्मीर से जोड़ना गैरािम्मेदारना भी है और खतरनाक भी। तत्काल ऐसे नतीजों पर पहुंचने वाले विश्लेषण भी तरस खाने लायक ही हैं। यह तर्क एक साथ दो चीजों को नारंदाज करता है। एक तो कश्मीर में उदार, लोकतांत्रिक और धर्मनिरपेक्ष व्यवस्था बनाने की नई दिल्ली की कोशिशें और दूसर इस मसले पर लगातार हो रही भारत-पाक वार्ता। यह पाकिस्तान की नई सरकार और सेना की स्थिति को भी नारंदाज करता है। जब तक कश्मीर का मसला रहेगा तभी तक पाकिस्तानी समाज और सत्ता पर वहां की सेना का दबदबा रहेगा। यह सच है कि पश्चिम अफगानिस्तान में हार रहा है और उसे पाकिस्तान के मदद की सख्त जरूरत है। पाकिस्तान भी यह धमकी दे रहा है कि वह अपनी सेना को पश्चिमी सीमा से हटाकर पूर्वी सीमा पर तैनात कर देगा। उनकी मदद के बदले में वह कुछ चाहता है। पश्चिम अब उसे एक ही चीज का प्रस्ताव दे सकता है और वह है कश्मीर। मिलीबैंड को ध्यान रखना चाहिए था जिन्होंने कश्मीर पर हमला किया और जो अफगानिस्तान में समस्या खड़ी कर रहे हैं उन्हें कश्मीर की चिंता नहीं है। कश्मीर में सक्रिय किसी भी संगठन ने मुंबई हमले को कश्मीर समस्या से नहीं जोड़ा। होटलों, ट्रेनों वगैर में हुए इस हमले का निशाना मुंबई में पश्चिमी पर्यटक और यहूदी थे। इस हमले के सूत्रधार लश्कर तोयबा के हाफ़िा सईद खुलकर इस्लामी दक्षिण एशिया की बात करते हैं। जिस तरह से इस्लामिक उग्रवाद के उदय का कारण फलीस्तीन समस्या के समाधान का होना नहीं है, उसी तरह इसका कारण कश्मीर की समस्या के समाधान का न हो पाना भी नहीं है। पाकिस्तान का पश्चिमी कबीलाई इलाका जो इस समय इस्लामी उग्रवाद की नर्सरी बना हुआ है, वहां कभी भी पाकिस्तान सरकार का मुकम्मल नियंत्रण नहीं रहा। अफगानिस्तान से खदेड़े गए तालिबान का अब यही केंद्र है। यहीं से वे अफगानिस्तान में तबाही ला रहे हैं और वहां की लोकतांत्रिक संस्थाओं को काम करने से रोक रहे हैं। लेकिन उनका उग्रवादी-दर्शन इससे कहीं आगे तक मार कर रहा है। यह किसी भी तरह से नहीं हो सकता कि भारत कश्मीर मसले पर पाकिस्तान को अपना उल्लू सीधा करने दे, ताकि उसकी सेना उत्तर-पश्चिम सीमा पर पश्चिमी देशों की मदद कर सके। हमें यह समझना होगा कि जिस आतंकवाद के कारण आज पाकिस्तान पर ही बन आई है, वह पाकिस्तान की उसी पुरानी नीति का नतीजा है, जिसमें वह इस्लामी आतंकवादियों और जेहादियों को जमा और उनकी मदद करके अपने पड़ोसियों को परशान करता रहा है। पश्चिमी सुरक्षा को असल खतरा अफगानिस्तान और पाकिस्तान के उस सरहदी इलाके से है, जहां अल कायदा और तालिबान अपनी पकड़ लगातार मजबूत बना रहे हैं। मिलीबैंड को पाकिस्तान की विदेश नीति के दोहरे चरित्र को समझना चाहिए था, इसके बजाए उन्होंने आग पर पैर धर दिया। अफगानिस्तान में ब्रिटेन और अमेरिका की समस्या का समाधान पाकिस्तान में है, कश्मीर में नहीं। मिलीबैंड की इस गलती के बावजूद भारत को उन्हें धन्यवाद तो देना ही चाहिए। अगर उनके बयान पर भारत ने इतना हंगामा न खड़ा किया होता तो शायद वाश्िंागटन तक यह संदेश नहीं पहुंचता कि भारत अफगानिस्तान में पश्चिम की नाकामी का ठीकरा कश्मीर पर किसी भी सूरत में नहीं फूटने देगा। लेखक किंग्स कॉलेज लंदन में प्राध्यापक हैं।

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