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गरीब हुए खाक, जो बुलंद थे, हैं अब भी

गांव में चार फरवरी को कई घर जले। ताज्जुब की बात कि ये घर हिन्दुओं के नहीं थे। मुसलमानों के भी नहीं थे। ये सिर्फ गरीबों के थे। गरीब की झोपड़ी खाक हो गई। अमीरों के महल तब भी बुलंद थे। आज भी हैं। बिशुनपुरा में आप एक पगडंडी से प्रवेश करते हैं। पक्की इमारतें हैं। इनकी सेहत पर कोई फर्क नहीं। मुहाने पर कई घर और दुकानें जली हैं। एक मशीन के अवशेष पर बच्चे प्रैक्िटस कर रहे हैं। बच्चों को नहीं पता कि उनके बाप का कारोबार खत्म हो गया है।ड्ढr ड्ढr कल के खाने की फिक्र इन बच्चों को नहीं है। इस घर के मुखिया बताते हैं-झोपड़ी के बदले इंदिरा आवास बनाने के लिए 20 हाार मिले थे। यह रकम आग की भेंट चढ़ गई। थोड़ा और आगे बढ़िये। एक शिक्षण संस्थान है। यह गरीब बच्चों के लिए है। यहां सभी धर्मो के ग्रंथ रखे हैं। ऊपरवाले की मेहरबानी है। धर्मग्रंथ बच गए। स्कूल में छुट्टी हो गई थी। सो, बच्चे भी निकल गए थे। इसके आगे एक धर्मस्थल है। अफवाह फैली कि इसमें आग लगा दी गई।ड्ढr ड्ढr असल में बगल के पुआल के ढेर में आग लगाई गई। आगे एक बड़ा मकान है। आरोप है कि इसी मकान से बम फेंके गए। सफेद रंग का यह मकान शान से खड़ा है। बगल की झोपड़ी खाक हो गई। झोपड़ी के मालिक कमाने के लिए परदेस गए हैं। घर में दो बेटे, पांच बेटियां और पत्नी हैं। पत्नी जार-ाार रो रही हैं। 14 साल के बेटे को गम नहीं है। वह छोटी सी दुकान करता है। महिला का एक आग्रह है-एक अदद इंदिरा आवास मिल जाए। एक आदमी इस संवाददाता को झकझोरता है-मेर घर आइए। घर में एक नौजवान बैठा है। उम्र 40 के करीब होगी। आदमी बताता है-यह मेरा बेटा है। जन्म से अंधा है। वह छत पर घूप सेंक रहा था। उसे ढकेलने की कोशिश की गई। ईश्वर को धन्यवाद कि वह बच गया। एक विधवा है। उसके पास तीन दुधारू जानवर थे। दो को आततायी ले गए। बछिए के शरीर पर छाले पड़े हैं। पता नहीं वह बचेगी भी। ये सब बुरी बातें हैं। अच्छी बात यह है कि दोनों फरीक जान गए हैं कि दहशतगर्दी का यह शौक आला दज्रे का है और गरीबों की हालत चाकू और खरबूजे की है। कोई किसी पर गिर, खरबूज ही कटेगा।ं

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