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प्रसारण पर मंत्रालय ही गंभीर नहीं

अभिव्यक्ित की स्वतंत्रता का अधिकार संविधान ने आम नागरिकों को दिया है। मीडिया के लिए कोई अलग से अभिव्यक्ित का विशेषाधिकार नहीं है। मीडिया नागरिकों का खुद को मंच बताकर इस अधिकार का इस्तेमाल करता है। मीडिया इस अधिकार का बड़े पैमाने पर दुरुपयोग भी कर रहा है और उसके व्यवहार के खिलाफ आम नागरिकों में काफी असंतोष और शिकायतें हैं। लेकिन जब सरकार मीडिया पर किसी तरह का अंकुश लगाने का विचार करती है तो इसका अर्थ यह नहीं है कि वो लोगों की शिकायतों को दूर करना चाहती है। सत्ता का स्वभाव तरह-तरह से मीडिया को नियंत्रित करने का होता है। पिछले दिनों सरकार ने मीडिया पर नियंत्रण के लिए कानून बनान की पहल यह साचकर की थी कि इस वक्त मीडिया को लेकर बहुत सारी शिकायतें हैं और वह कानून लागू करने में कामयाब हो सकती है। हालांकि यह एक तरह से लोगों के संवैधानिक अधिकारों में कटौती ही है। इसका अर्थ मीडिया को ही नियंत्रित करना नहीं, बल्कि नागरिकों के अधिकारों को सीमित करना भी है। संसद के पिछले सत्र में सूचना प्रौद्योगिकी संबंधी स्थायी समिति ने अपनी रिपोर्टे में इस बात के लिए तो गंभीर चिंता जाहिर की है कि पिछले ग्यारह वषों के दौरान सरकार द्वारा विभिन्न प्रयासों के बावजूद अभी तक प्रसारण पर एक उपयुक्त कानून नहीं बन पाया है। जबकि 1में सुप्रीम कोर्ट ने एक निर्णय दिया था कि वायु तरंगें सार्वजनिक संपति है और सरकार द्वारा राष्ट्रीय हित में इस पर निगरानी रखन के लिए नियम कानून बनने चाहिए। उसके बाद 1में सरकार ने संसद में प्रसारण विधयक पेश किया। तब से अब तक बीस बार प्रसारण विधयक के प्रारूप में सरकार परिवर्तन कर चुकी है। संसद की इस समिति का कहना है कि प्रसारण सेवाओं पर निगरानी रखन की प्रणाली टुकड़ों में बंटी हुई हैं। केबल टेलीविजन नेटवर्क (विनियमन) अधिनियम में विषय वस्तु विनियमन के लिए व्यापक दंड प्रावधान है। लकिन इसके अलावा और भी कानून हैं, जिनका सूचना एवं प्रसारण मंत्रालय इस्तेमाल करके चैनलों के विषय वस्तु और विज्ञापन को विनियमित कर सकता था। इसमें स्त्री अशिष्ट रूपण (प्रतिषेध) अधिनियम 1उपभोक्ता संरक्षण अधिनियम 1चलचित्र अधिनियम 1औषधि और चमत्कारिक उपचार (आक्षेपणीय विज्ञापन) अधिनियम 1संप्रतीक और नाम (अनुचित उपयोग निवारण) अधिनियम, खाद्य उपमिश्रण निवारण अधिनियम1पुरस्कार प्रतियोगिता अधिनियम, प्रतिलिप्याधिकार अधिनियम 1भेषजी अधिनियम 1औषधि और प्रसाधन सामग्री अधिनियम 10 शामिल है। लकिन समिति ने इस पर दु:ख प्रगट किया कि 2005, 2006 और 2007 के दौरान चूक करने वाले चैनलों को केवल 221 नोटिस भेजे गए और आदेश, परामर्श, चेतावनी, क्षमायाचना की सूची जैसी कार्रवाई जिसका कि ज्यादा अर्थ नहीं है, केवल 67 मामलों में किए गए। गत कई वषों से अत्याधिक राष्ट्रीय महत्व के इस मुद्दे पर मंत्रालय की ओर स कार्रवाई या वस्तुत: इच्छााक्ित की कमी को देखकर समिति क्षुब्ध हैं। प्रसारण विषय वस्तु में सभी प्रकार के उल्लंघनों से निपटन के लिए इतने सारे कानूनों के मौजूद रहन के बावजूद मंत्रालय उनका उपयोग करने में और उल्लंधनकर्ताओं के विरु कार्रवाई करने में पूरी तरह विफल रहा है। सरकार के हर दफ्तर में नौकरशाहों के अंदर एक ऐसा चरित्र बैठा है जो मौजूदा कानूनों को लागू करने में अपनी नालायकी को यह कहकर छिपाता है कि कानून कमजोर हैं। इसीलिए समिति ने इस लाचारी को तर्कसंगत नहीं माना कि सूचना एवं प्रसारण मंत्रालय इन विधानों के लिए प्रशासनिक मंत्रालय नहीं है और मंत्रालय अपने विधान के साथ जो कि आज तक मूर्त रूप नहीं ले पाया, ज्यादा निर्णायक रूप स कार्रवाई कर सकेगी। समिति के समक्ष मंत्रालय के सचिव ने स्वीकार किया है कि वे पन्द्रह वषों के दौरान ज्यादा कुछ नहीं कर सके हैं। दरअसल, सूचना एवं प्रसारण मंत्रालय के पास कोई सांस्कृतिक परिकल्पना ही नहीं है। वह आम दफ्तरों की तरह फाइलों का इंतजार करता रहता है। संसद की इस समिति का यह कहना इस मंत्रालय की निकम्मेपन की पोल खेलन के लिए पर्याप्त है कि पिछले पन्द्रह वषों से मंत्रालय की घोर निष्क्रियता के कारण एकमात्र रेटिंग एजेंसी को अपने रेटिंग व्यापार (टीआरपी) को एकाधिकार के रूप में चलान की छूट मिल गई। इसका परिणाम यह है कि चैनल ऐस कार्यक्रमों का प्रसारण कर रहे हैं, जो न तो आम आदमी की प्राथमिकताओं के अनुरूप है और न ही भारत जैसे विविधापूर्ण देश की सामाजिक लोक संस्कृति के अनुरूप हैं। दिलचस्प यह है कि पहली बार 8 जनवरी 2008 को टीआरपी के व्यापार के मामले में मंत्रालय जागा और ट्राई की तरफ टीआरपी को लेकर अपनी सिफारिशों देने के लिए फाइल बढ़ा दी। नये मीडिया की गति के आगे तो नौकरशाही ढांचा बेहद पिछड़ा हुआ है। अपने पिछड़ेपन की विद्रूपताओं को वह ऐसे कानूनों से छिपाना चाहता है। लेखक स्वतंत्र पत्रकार हैं।

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