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राजगीर में मिला दूसरा बड़ा स्तूप

घोड़ाकटोरा (नालंदा) के समीप राजगीर की पंचपहाड़ियों में से एक गिरिव्रज पर 1050 फुट की ऊंचाई पर पुरातत्ववेत्ताओं ने केसरिया के बाद दूसरा सबसे विशाल स्तूप को ढूंढ़ निकाला है। भारतीय पुरातत्व सव्रेक्षण के इतिहास में इसे एक अद्भुत खोज मान जा रहा है। लगभग 70 फुट लंबाई व 70 फुट चौड़ाई को लेते हुए 20-25 फुट ऊंचाई तक पत्थरों को काटकर बनाया गया है जबकि इसके ऊपर गुप्तकालीन कला की तर्ज पर अलंकृत ईंटों से स्तूप का निर्माण किया गया है। इसके चारों ओर प्रदक्षिणा पथ बना हुआ है जो रखरखाव के अभाव में बर्बाद हो रहा है।ड्ढr ड्ढr ईंट व पत्थरों से बने स्तूप के बीच 40 फुट लंबा व 40 फुट चौड़ा पानी का टैंक बना हुआ है। यह संरचना अजातशत्रु द्वारा बनाये गये विश्वप्रसिद्ध साइक्लोपियन वाल के किनार बनी है। साइक्लोपियन वाल के ऊपर चढ़कर ही इस संरचना तक पहुंचा जा सकता है। पुरातत्ववेत्ता सुजीत नयन बताते हैं कि केसरिया स्तूप के बाद यह दूसरा विशालतम स्तूप है। इस स्तूप तक लॉर्ड कनिंघम भी नहीं पहुंच सके थे। वे बताते हैं कि पंचाने नदी के एक छोर पर ताम्रपाषाणकालीन घोड़ाकटोरा एवं दूसरी छोर की गिरिव्रज पहाड़ी पर अवस्थित इस स्थल को विकसित किया जाए तो इसमें देश का सबसे बड़ा पर्यटक स्थल बनने की क्षमता है। यह पर्यटन के क्षेत्र में बिहार की आय के सबसे बड़े स्त्रोत के रूप में भी उभर सकता है। स्तूप के समीप अवशेषों से पता चलता है कि यहां गुप्तकाल में भी नगरीय व्यवस्था रही होगी।

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