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रुक सकता है एक अरब के ठेके का आवंटन

ग्रामीण विकास विभाग फंड के मामले में काफी धनी है। केंद्र और राज्य सरकार ग्रामीण इलाकों में विकास के लिए खास तौर पर सड़क निर्माण के लिए सालाना करोड़ों रुपये देती है। पूर राज्य में करीब डेढ़ अरब रुपये से सड़क निर्माण का काम जारी है। एक अरब से ज्यादा का काम आवंटित करने की तैयारी थी, जिस पर अब रोक लगने की संभावना है। विभाग में मुख्य अभियंता के पद पर अनुग्रह प्रकाश हैं। उनसे पूछने पर कहते हैं कि अब तो सब ठेका कैंसिल हो जायेगा। छप गया अखबार में। एक अरब से अधिक का काम पूर राज्य में आवंटित किया जाना था, अब क्या होगा, वह दो-तीन दिन बाद पता चलेगा।ड्ढr इस विभाग में सियारंजन प्रसाद सिंह कार्यपालक अभियंता हैं। मूल रूप से ये पथ निर्माण विभाग के हैं, लेकिन तीन स्थानों पर काम देख रहे हैं। जबकि अभियंताओं की पूरी फौज इस विभाग में पड़ी है। सिंह अभियंता प्रमुख के यहां कार्यपालक अभियंता के प्रभार में हैं। वहीं मुख्य अभियंता के यहां भी कार्यपालक अभियंता हैं। साथ ही झारखंड स्टेट रूरल रोड अथॉरिटी (जेएसआरआरडीए) में भी कार्यपालक अभियंता के पद पर काम कर रहे हैं। इन तीनों में काम का इतना बोझ है कि कोई भी अभियंता स्थल निरीक्षण नहीं कर सकता। लेकिन इनके द्वारा जो मापी पुस्तिका दुरुस्त की जा रही है, उसमें यह दिखाया जाता है कि वे सड़क निर्माण कार्य देखने कभी गिरिडीह, तो कभी चतरा गये। सब कुछ कागज पर चल रहा है। इनकी हैसियत का अंदाजा इसी से लगाया जा सकता है कि वर्ष 2003 से ही रांची में हैं और एक ही विभाग में काम कर रहे हैं। कभी सरकार की नजर इन पर नहीं पड़ी। जेएसआरआरडीए मूल रूप से प्रधानमंत्री ग्रामीण सड़क रोजगार योजना के तहत बननेवाली सड़कों के निर्माण का लेखा-जोखा रखता है। फंड पूर राज्य में इसी विभाग में आता है और यहीं से जारी होता है। इसके दफ्तर में ठेकेदारों और अभियंताओं की भीड़ देखते बनती है। कार्यपालक अभियंता सियारंजन प्रसाद सिंह कहते हैं कि तीन स्थानों पर प्रतिनियुक्त नहीं है। अभियंता प्रमुख के यहां कोई काम नहीं था। तो मुख्य अभियंता के यहां चले गये। थोड़ा काम जेएसआरआरडीए का देखते हैं। समय नहीं मिलता है, वहां जाने का।ड्ढr इधर, पूर मामले को राज्यपाल के सलाहकार जी कृष्णन ने गंभीरता से लिया है। विभाग के आलाधिकारियों से उन्होंने रिपोर्ट देने को कहा है। बताते चलें कि प्रधानमंत्री ग्रामीण सड़क रोजगार योजना के तहत अधिकांश नक्सलग्रस्त जिलों में सड़कें बनायी जाती हैं, ताकि पिछड़े इलाकों को जिला मुख्यालय से जोड़ा जा सके। इसमें 70 फीसदी राशि केंद्र देती है और 30 फीसदी राशि राज्य सरकार की होती है।

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