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लल्लू लगावें, सल्लू गिरावें

ारसी में एक कहावत है- ‘हरचे आमद इमारते नो साख्त’ (ाो भी आया उसने एक नई इमारत बनवाई)..भले ही इमारत टेढ़ी-मेढ़ी बनी हो और कुछ ही दिनों में ‘हरि बोल’ हो जाए पर बनवाएंगे जरूर। काहे से कि हम भी पावर रखते हैं और पाव भर अनाज खाते हैं। शिलान्यासों के कितने ही पत्थर आज फ्लैट पड़े हैं और उन पर धोबीजन कपड़े पछार रहे हैं। एक ने मूर्ति लगवाई, दूसरे ने आते ही उखड़वा कर ढेर कर दी। हो सकता है कि आने वाले दिनों में फेरीवाले ठेले पर मूर्तियां लादे आवाज लगाएं- ‘मूर्तियां ले लो मूर्तियां। छत पर, चबूतर पर लगाओ-सजाओ।’ यही हाल योजनाओं का है। एक ने बनाई, दूसर ने आते ही रद करके गमछे में बांधी और मचान पर फेंक दी। बुश ने बनाई, ओबामा ने रद कर दी। हम अपनी बनाएंगे। और कुछ करं न करं, योजनाएं तो बना ही सकते हैं। कौन सा खीसे से पैसा लगता है? नहीं बनाएंगे तो लोग फंटी मारंगे- ‘अमां क्या पावर में आया है। योजनाएं भी नहीं बना सकता?’- मसलन बुश ने पाकिस्तान को गोद में लिटा कर बोतल से दूध पिलाया। ओबामा ने आते ही बोतल फेंक दी और तड़ से पाक की सहायता राशि में 5 करोड़ 50 लाख डॉलर की कटौती कर दी। जरदारी टसवे बहा पड़े- हाय अब्बा, मेरा कसूर क्या है कि माल छीन लिया। अब बच्चों (आतंकवादियों) का खर्च कैसे चलेगा? लंगोटा बांध कर बम फेंकेंगे क्या? मेर इलाके में एक लोकल नेता किसी विकास योजना का शिलान्यास करने आए। मौलाना लादेन हत्थे से उखड़ गए। बोले- ‘भाई मियां, आप कोई लपड़-शपड़ भाषण देकर जबानी शिलान्यास कर लो। पत्थर मत गाड़ना। होना-हवाना कुछ है नहीं। खामख्वाह पत्थर और लिखावट के पैसे जाया होंगे। बाद में सड़क पर छुट्टा घूमने वाले गाय बैल पत्थर पर छिड़काव करंगे। आप शिलान्यास वाले शब्द बोल दो बस। इलाके वाले तसल्ली कर लेंगे कि हो गया विकास।’ मेर यूपी के रायबरली जनपद में एक अति पावरफुल महिला ने रल कोच फैक्ट्री का शिलान्यास किया। दूसरी अति पावरफुल महिला भड़क उठीं। बोलीं कि दोबारा शिलान्यास क्यों? 5-6 वर्षो में कोच फैक्ट्री क्यों नहीं बनवाई? अब दूसरी अति पावरफुल महिला को कौन समझाए कि बहना, शिलान्यास और निर्माण में लंबा अंतर होता है। सार शिलान्यास निर्माण में बदल गए होते तो किसी गड़े हुए पत्थर पर कौवा बैठा नजर नहीं आता। ज्यादा बड़े सपने देखने में आंखों में आंसू ही बाकी रह जाते हैं। राज ठाकर और उनके गुंडों ने पुन: मुंबई में हड़कंप का शिलान्यास कर दिया है। काफी दिनों तक बिल में घुसे-घुसे हाथ पांव अकड़ गए हैं। अल्ला ने चाहा तो इस बार ऐसी खुदाई मार पड़ेगी कि नाम की स्पेलिंग भूल जाएंगे। वैसे नंगों से अल्लाह भी पनाह मांगता है। वसीम बरलवी का कहा याद आता है- ‘हर शख्स दौड़ता है यहां भीड़ की तरफ..फिर यह भी चाहता है उसे रास्ता मिले।’ं

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