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रैगिंग कैसे रुकेगी

रैगिंग ऐसा मामला है, जिसे शिक्षा संस्थानों को अपने स्तर पर ही हल कर लेना चाहिए था, लेकिन सुप्रीम कोर्ट को इसमें हस्तक्षेप करना पड़ा। इससे पता चलता है कि शिक्षा संस्थान अपनी जिम्मेदारी के प्रति कतई गंभीर नहीं थे। रैगिंग का जो स्वरूप बन गया है, वह हल्के-फुल्के मााक से ज्यादा आपराधिक परपीड़न के स्तर पर पहुंचा हुआ है और छात्र अक्सर इसमें गंभीर रूपसे घायल होते हैं या अपमान और उत्पीड़न की वजह से शिक्षा संस्थान छोड़ने पर मजबूर होते हैं। रैगिंग के सिलसिले में कई मौतें भी हुई हैं। इससे भी गंभीर बात यह है कि यह कुप्रथा हमार नौजवानों को परपीड़न के प्रति संवेदनहीन बनाने का काम करती है। यह प्रथा अब तक चली इसलिए आ रही है कि शिक्षा संस्थान चलाने वाले भी इसी व्यवस्था से गुजर हुए होते हैं इसलिए उनका रवैया आमतौर पर टालने वाला या रफादफा करने वाला होता है। सुप्रीम कोर्ट के आदेश में अच्छी बात यह है कि इसमें शिक्षा संस्थानों को जवाबदेह बनाया गया है और रैगिंग न रोकने की स्थिति में उनका अनुदान घटाने या बंद करने की भी बात की गई है। डॉ. आर. के. राघवन कमेटी का गठन सुप्रीम कोर्ट की सिफारिश पर 2006 में किया गया था और 2007 में इसकी रपट पर सुप्रीम कोर्ट ने अंतरिम आदेश दिया था। लेकिन जिनकी रैगिंग रोकने की जिम्मेदारी है, यानी शिक्षा संस्थानों के अधिकारी और कानून का पालन सुनिश्चित करवाने वाली प्रशासकीय मशीनरी, दोनों ने ही इस बीच ठोस कदम नहीं उठाए। हालांकि औपचारिक रूप से आदेश सभी शिक्षा संस्थानों ने जारी किए हैं, लेकिन खास कर मेडिकल और इांीनियरी कॉलेजों में रैगिंग बदस्तूर जारी है। इसके जारी रहने की खास वजह यह है कि रैिगग करने के अपराधी छात्रों पर कभी गंभीर कार्रवाई नहीं की जाती। यहां तक कि रैगिंग में किसी की मौत होने पर भी शिक्षा संस्थान या पुलिस प्रशासन उसे रफादफा ही करने की कोशिश करता है। सुप्रीम कोर्ट के हस्तक्षेप के बाद यह हुआ है कि रैगिंग के मामलों को इन्कार करने और इसे छात्रों के आपसी झगड़े बताने की प्रवृत्ति बढ़ गई हैं। क्या अब हम उम्मीद कर सकते हैं कि शिक्षा संस्थान अपनी जिम्मेदारी समझेंगे और सुप्रीम कोर्ट को फिर हस्तक्षेप नहीं करना पड़ेगा?

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  • Web Title: रैगिंग कैसे रुकेगी