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सुमति-कुमति ..

वह अरसे बाद मिले थे। एकबारगी तो पहचानना ही मुश्किल हो गया था। क्या हाल बना लिया था उन्होंने अपना? मैंने टोका, ‘क्या कर लिया है तुमने?’ धीरे-धीरे उन्होंने अपना हाल बताया। फिर बोले, ‘अब मेरा कुछ नहीं हो सकता। मैंने खुद ही अपनी जिंदगी बिगाड़ ली है।’ मैं काफी समझाता रहा। वह मानने को तैयार नहीं हो पा रहे थे कि सुधर सकते हैं। मैं उनसे बात कर रहा था और तुलसीदास को याद कर रहा था। बीच में उन्हें मैंने तुलसी की एक खास पंक्ित का जिक्र भी किया था। सुमति कुमति सब के उर बसई बिगड़ी जनम अनेक की सुधरत पल न लागे आध। तुलसीदास कहते हैं सुमति और कुमति दोनों दिल में बसती हैं। यानी अच्छाई और बुराई सबमें होती है। लेकिन ऐसा नहीं है कि कोई सुधर ही न सके। हर हाल में सुधरने की गुंजाइश होती है। और जब कोई सुधरने की कोशिश में लग जाता है, तो आधा पल भी नहीं लगता। तुलसी के पास तो एक ही औषधि थी। हर मर्ज की एक दवा। राम की शरण में चले जाओ। उनके लिए राम जीवन मूल्य हैं। और आपने अगर अपने जनम-ानम को भी बिगाड़ लिया है, तो वह भी सुधर सकता है। राम मर्यादा पुरुषोत्तम हैं। उनकी शरण में जाने के लिए आपको एक मर्यादा तो रखनी होगी। आपको उत्तम पुरुष बनना होगा। उत्तम आचरण करना होगा। और इन चीजों को आप अपने जीवन में उतार कर तो देखिए। फिर कुमति का क्या काम? यह तो सुमति की राह है। आप जब मर्यादा रख कर उत्तम होने की कोशिश करते हैं, तो जीवन ठीक होना ही है। सब कुछ बदलना ही है। अमर्यादित हो कर आपने अपनी जिंदगी को बिगाड़ जो दिया है, उसे सुधारंगे भी आप ही। आप ही ने जिंदगी बिगाड़ी है आप ही उसे सुधारंगे। कोई आपकी जिंदगी न बना सकता है और न बिगाड़ सकता है। तो अपनी जिंदगी को सुधारने में जुट जाओ। यह भूल जाओ कि बिगड़ी जिंदगी सुधर नहीं सकती। अगर सुधारने पर आओगे, तो एक पल नहीं लगेगा। जिस जतन से आपने अपनी जिंदगी बिगाड़ी है, उसी जतन से उसे सुधारने में लग जाओ।

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