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एक अच्छे भारतीय की अस्मिता

भारतीय पत्रकारिता के एक बिसरे स्तंभ हैं- सैयद अब्दुल्ला बरेलवी। गूगल पर वे ‘एस.ए. बरेलवी’ के रूप में दर्ज हैं और दक्षिण मुंबई में एक सड़क उनके नाम पर है। इस सड़क का नाम तब रखा गया था, जब जमाना जागरूक था और मुंबई के लोग आजाद थे। वे उन लोगों की तारीफ करने को तत्पर रहते थे, जो हिंदूू नहीं थे और न ही मराठी थे। बरेलवी ने जिस शहर को अपनाया वहां उनका योगदान उच्चस्तरीय था। जसा कि उनके तखल्लुस से पता चलता है कि वे मूलत: उत्तर प्रदेश के बरेली शहर के थे। वे मुंबई एक पत्रकार के तौर पर काम करने आए थे।1में उन्हें बांबे क्रॉनिकल का संपादक बनाया गया। यह अखबार एक दशक पहले टाइम्स आफ इंडिया के राष्ट्रवादी विकल्प के तौर पर शुरू किया गया था। वे उस पद पर 18 साल बाद यानी अपने निधन तक रहे। स्वाधीनता संग्राम की मदद करने में बरलवी और उनके अखबार की भूमिका का जिक्र मिल्टन इजराइल ने अफनी किताब ‘कम्यूनिकेशन्स एंड पावर’ में किया है। बांबे क्रानिकल ने गांधी के छुआछूत विरोधी अभियान का शुरुआत में ही समर्थन कर दिया था। इस अखबार ने बंबई के कपड़ा मजदूरों की दशा पर संवेदनशील ढंग से खबरं दी थीं। महानगरीय सभ्यता का हिस्सा होने के नाते यह अखबार सिर्फ राजनीतिक विषय पर ही केंद्रित नहीं रहता था। उसका खेल पेज बेहतरीन होता था और वह हिंदी फिल्म उद्योग के बार में भी व्यापक तौर पर छापता था। बरलवी बांबे क्रॉनिकल के संपादक उस समय बने जब स्वाधीनता संग्राम में भ्रम की स्थिति थी। सन् 10-22 के असहयोग आंदोलन के दौरान हिंदू-मुसलमान, उत्तर और दक्षिण भारतीय सभी लोग महात्मा गांधी की अपील पर उठ खड़े हुए थे। लेकिन उसके बाद लोग अपने-अपने मूल समुदाय की सुविधा और सुरक्षा के घेरे में लौटने लगे थे। लेकिन बरलवी जो निजी अस्मिता की सीमाओं को नहीं मानते थे, इस ढर्र से दुखी थे। बांबे क्रॉनिकल के 26 मई 1े अंक में प्रकाशित (और इजराइल की किताब में उद्धृत) संपादकीय में उन्होंने जिस तीखे सवाल को उठाया था वह आज भी प्रासंगिक है। ‘‘अगर इन दिनों एक आधुनिक डायोजीन्स (एक दार्शनिक) लालटेन लेकर भारतीयों की तलाश में निकले तो उसे कुछ क्रोधित हिंदू मिलेंगे, कुछ कट्टरपंथी मुसलमान मिलेंगे और कुछ अतिवादी आत्माएं मिलेंगी, जो लगातार यह ढूंढने मे लगी हुई हैं कि उनके अपने समुदाय के साथ कितनी नाइंसाफी हो रही है। एसी स्थिति में उस दार्शनिक को दु:खी हो कर कहना पड़ेगा ,‘‘आखिर कहां हैं भारतीय?’’ हाल में आउटलुक पत्रिका में छपे एक पत्र को पढ़ते हुए मुझे बरलवी का वह चुभता सवाल याद आया। उस पत्रिका में स्वतंत्रता सेनानी से संपादक बने एच.आई. शारदा प्रसाद पर श्रद्धांजलि छपी थी। पत्र लिखने वाले ने उस पर आपत्ति जताते हुए कहा था कि उसमें शारदा प्रसाद की उस सबसे बड़ी कमी की अनदेखी कर दी गई है कि उन्होंने कन्नड़ भाषियों से लगाव नहीं दिखाया। दिल्ली में अपने 40 साल के निवास के दौरान वे 20 साल प्रधानमंत्रियों के साथ रहे पर उन्होंने अपनी जुबान बोलने वालों की कोई विशेष मदद कभी नहीं की। उस पाठक ने जिस चीज को उनकी कमजोरी कहा है, कुछ लोग उसे ही उनकी सबसे बड़ी ताकत मानते हैं। जब बरलवी ने यह सवाल पूछा था, ‘‘कहां हैं भारतीय?’’ तब 1में जन्मे शारदा प्रसाद बहुत छोटे थे। लेकिन हाई स्कूल के दिनों से लेकर बाद से 65 वर्षो तक के जीवन में उनका आचरण एसा रहा कि उनकी मुख्य अस्मिता के बार में किसी को कोई संदेह हो ही नहीं सकता था। वह अस्मिता थी -भारतीय। इसका मतलब यह नहीं है कि वे अपनी संस्कृति और परंपरा से जुड़े नहीं थे। वास्तव में आउटलुक के उस पाठक को मालूम ही नहीं कि कन्नड़ भाषा में उनका क्या योगदान था और उसे कम ही याद किया जाता है। उन्होंने शिवराम कारंत की रचनाओं का अंग्रेजी में अनुवाद किया था। इस प्रकार किसी कन्नड़ भाषी को सरकारी नौकरी दिलवाने या उन्हें इंदिरा गांधी से मिलवाने के मुकाबले उनका वह काम कन्नड़ भाषियों की ज्यादा बड़ी सेवा थी। शारदा प्रसाद की पृष्ठभूमि संगीत और साहित्य की थी। उनके पिता कर्नाटक शैली के संगीतकार थे। उनका भानजा लोकप्रिय संगीत मंडली इंडियन ओसेन का प्रमुख सदस्य है। शारदा प्रसाद स्वयं हिंदुस्तानी शास्त्रीय संगीत के गहर जानकार थे। आधुनिक कर्नाटक के महान लेखक और संगीतकार -शिवराम कारंत, डी. आर. बेंद्रे, गंगूबाई हंगल, मल्लिकाजरुन मंसूर वगैरह अक्सर उनके घर पर ठहरते थे और उनकी मित्रता व पत्नी कमला के सत्कार का आनंद लेते थे। कन्नड़ में पारंगत होने के अलावा शारदा प्रसाद की अंग्रेजी, तमिल और तेलुगु पर अच्छी पकड़ थी । उन्हें हिंदी और संस्कृत भी आती थी। अपने जीवन और कर्म में उन्होंने अपने राज्य और उससे सटे राज्यों के संबंधों को गहराई प्रदान की। हालांकि उनकी जड़ें उस दक्षिण भारत में ही रहीं जो इस महान और कभी अशांत देश का हिस्सा है। वे एक अच्छे कन्नड़ और बेहतर भारतीय थे। शारदा प्रसाद की भारतीयता कैसी थी, इसकी एक झलक उस चिट्ठी में पाई जा सकती है, जो उन्होंने अपने 1वें जन्मदिन पर माता-पिता को लिखी थी। उस समय भारत छोड़ो आंदोलन में हिस्सा लेने के कारण वे जेल में थे। सुगत श्रीनिवासराजू द्वारा अनूदित उस पत्र के अंश इस प्रकार हैं- ‘‘ बहुतों को नहीं मालूम था कि मेरा जीवन इस ढर्र पर आ जाएगा। पर मैं भीतर से अक्सर यह महसूस करता था कि एक दिन मैं स्वाधीनता संग्राम का एक सिपाही बनूंगा। अपने नए जीवन के लिए मुझमें जो भी गर्व है, उस पर मेरा अधिकार है। पर यह गर्व किसी और वजह से नहीं है, न ही इसमें आत्मप्रेम का तत्व है। बल्कि इससे हमारा आत्मसमर्पण ही मजबूत होगा। कुछ समय पहले जब हम मिले थे तो आप ने कहा था कि जेल का झगड़ालू माहौल मुझ पर विपरीत असर डालेगा। पर हुआ उल्टा। मुझे लगता है कि जेल के जीवन ने हमें मानव स्वभाव और उसके विभिन्न गुणों के बार में भावुकता से रहित हो कर सोचने का मौका दिया है। इससे मुझे मनुष्य की विनम्रता के गुणों के बारे में ज्यादा साफ तरीके से समझने का मौका मिला है।’’ जेल से निकलने के बाद वे ‘योजना’ पत्रिका के संपादक बने और फिर प्रधानमंत्रियों के सूचना सलाहकार रहे। हमार एक मित्र ने कहा था कि शारदा प्रसाद चिंतनशील लोगों के खुशवंत सिंह हैं। यह तुलना सटीक तो थी पर अधूरी थी। उनका ज्ञान चारित्रिक निष्ठा के आगे वंदना करता था और देश के लिए उनकी निष्ठा नि:स्वार्थ थी। सभी गुणों से ऊपर उनकी पहचान एक भारतीय की थी। लेखक प्रसिद्ध इतिहासकार हैं।ं

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