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बुरा मानो या भला : वैलेंटाइन विरोधियों पर हंसो

आपने यह जरूर महसूस किया होगा। खूबसूरत लोग भी जब कोई नफरत भरी बात कहते हैं, तो किस कदर भद्दे लगते हैं। श्रीराम सेना के संस्थापक मुतालिक को देखते हुए मैंने ऐसा महसूस किया। वह आमतौर पर एक ठीकठाक अधेड़ लगते हैं। लेकिन मंगलूर के पब में अपने गुंडों की तरफदारी करते हुए वह कितने अलग दिख रहे थे। वह मुझे ऑस्ट्रेलिया के ‘तस्मानियन डेविल्स’ की याद दिलाते हैं। वे शायद दुनिया के सबसे भद्दे जानवर हैं। दूसरी ओर रेणुका चौधरी हैं। मुतालिक के मारे लोगों का मुद्दा उठाते हुए वह अपनी उम्र से कितनी कम लग रही थीं। वह सही कह रही थीं कि मुतालिक ऐंड कंपनी का हिंदुस्तानी तहाीब से कोई लेना-देना नहीं है। मेरा तो यह मानना है कि मुतालिक जसे लोगों का हिंदुस्तानी ही क्या, किसी भी तहाीब से ताल्लुक नहीं है। अभी कुछ दिन पहले तक मुतालिक को मंगलूर की झोपड़पट्टी से आगे कोई जानता नहीं था। आज उन्हें देशभर में जाना जाता है। हर टीवी चैनल और अखबार मुतालिक को दिखा रहा है। 15 दिन में वह एक अनजान आदमी से सेलिब्रिटी हो गए हैं। अब वह फटाफट मशहूर होने का फॉमरूला जान गए हैं। उन्होंने वैलेंटाइन डे के विरोध का फरमान जारी कर दिया है। मुझे कोई शक नहीं कि उनके लोग कुछ जोड़ों से मारपीट करंगे। अपने तजुर्बे से वह समझ चुके हैं कि अपने काम से काम नहीं रखना चाहिए। दूसर के काम में टांग अड़ानी चाहिए। यों मैं निजी तौर पर मानता हूं कि वैलेंटाइन डे पर कार्ड भेजना, अखबारों में इश्तिहार देना और अपने प्यार का क्षहार करना बेवकूफी है। लेकिन मैं कौन होता हूं, जो यह तय कर कि दूसरों को क्या करना चाहिए या क्या नहीं? यह एक आजाद देश है। उसमें हर शख्स को यह हक है कि जो चाहे कर। बस यह खयाल रखना जरूरी है कि उससे किसी को बेवजह चोट न पहुंचे। दरअसल, शिव सेना, बजरंग दल, श्रीराम सेने वगैरह संगठन इस सीधी-सादी बात को नहीं समझते। रणुका का मानना है कि जो देश का कानून अपने हाथ में लेते हैं, उन्हें जेल भेज देना चाहिए। मैं उनसे सहमत नहीं हूं। उसकी वजह यह है कि ऐसा करने से हम उन विलेन को हीरो बना देंगे। असल में जो हिंसा करते हैं, उन्हें ही जेल में भेजना चाहिए। जो भी उन्हें भड़का रहा है, उनसे सख्ती से पेश आना चाहिए। इन लोगों से निपटने के लिए एक बेहतर तरीका उनका मजाक उड़ाना है। उन्हें नौटंकी के विदूषक की तरह लेना चाहिए। या सर्कस के जोकर की तरह। उन पर जोरदार ढंग से हंसना चाहिए। इतना हंसें कि लोग उन्हें कभी गंभीरता से न ले सकें। सुनहरी विरासत लाला लाजपत राय की जयंती चुपचाप निकल गई। कहीं कुछ नहीं हुआ। न देश में और न ही उनसे जुड़ी संस्थाओं में। लालाजी पर स्वामी दयानंद का असर था। स्वामी जी आर्य समाज के संस्थापक थे। हालांकि वह गुजराती थे, लेकिन उनका असर उत्तर भारत में ज्यादा रहा। उनकी वजह से ही डीएवी स्कूल और कॉलेज देश भर में बने। अपने 120 साल के इतिहास में डीएवी ने सात सौ से ऊपर संस्थाएं बनाईं। मेर खयाल से शायद ही किसी और ने इतनी संस्थाएं बनाई हों। हैरानी की बात है कि और शिक्षा संस्थाओं की तरह वहां गुटबाजी और भ्रष्टाचार नहीं के बराबर है। ऐसा शायद उन लोगों की वजह से हो सका, जिन्होंने उसके काम को अपना मिशन बना लिया। एक मिसाल हंसराज थे। 18में वह लाहौर में बने डीएवी स्कूल के हैडमास्टर थे। वह कोई पैसा नहीं लेते थे। उन्होंने अपनी पूरी जिंदगी स्कूल बनाने में लगा दी। ऐसे ही उन्हें महात्मा नहीं कहा जाता। दिल्ली में हंसराज कॉलेज उन्हींके नाम पर बना। उनके बाद लाला लाजपत राय, बलराज भल्ला, मेहरचंद महाजन, जीएल दत्ता, सूरा भान, वेद व्यास, टीआर तुली वगैरह ने उस काम को आगे बढ़ाया। हाारों लोग डीएवी स्कूल और कॉलेज में पढ़े। उनमें खास हैं नोबल पुरस्कार विजेता हरगोबिंद खुराना, इंदरकुमार गुजराल, अटल बिहारी वाजपेयी, कपिल देव, जगजीत सिंह, शाहरुख खान और शहीद भगत सिंह और क्रांतिकारी बालमुकुंद। फिलहाल डीएवी के अध्यक्ष पद्मश्री ज्ञानप्रकाश चोपड़ा हैं। वह गवर्नमेंट कॉलेज लाहौर से पढ़े-लिखे हैं। बंटवार के बाद वह डीएवी कॉलेज होशियारपुर में अंगराी पढ़ाने लगे। 1में दिल्ली के हंसराज कॉलेज से जुड़े। वहां से प्रिंसीपल हो कर रिटायर हुए। चोपड़ा जी जसे लोग ही स्वामी दयानंद और लाला लाजपत राय के सपनों को पूरा कर सकते हैं।

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