प्लैटो कैसे हो गए अफलातून - प्लैटो कैसे हो गए अफलातून DA Image

अगली स्टोरी

class="fa fa-bell">ब्रेकिंग:

प्लैटो कैसे हो गए अफलातून

पाकिस्तानी मानते हैं कि बॉलीवुड की जुबान उर्दू है। उनके लिए वाजपेयी जो बोलते हैं, वह हिंदी है। भारतीय मानते हैं कि बॉलीवुड की जुबान हिंदी है और पीटीवी पर जो बोला जाता है वह उर्दू है। दरअसल, हिंदी और उर्दू की एक ही जुबान हिंदुस्तानी है, जो अलग लिपियों में लिखी जाती है।

उर्दू की ज्यादातर ध्वनियां संस्कृत से आई हैं। मसलन, फूल शब्द को अरबी में लिखना मुमकिन ही नहीं है। अरबी में संस्कृत वाला प और फ नहीं है। अजीब लगता है क्योंकि उसका उच्चारण मुश्किल नहीं है। दूसरे अरबी में ग भी नहीं है। इसलिए अरबी में मैकडॉनाल्ड के विज्ञापनों में हैमबर्गर की जगह हैमबर्जर लिखा होता है।

अरब लोग पाकिस्तान भी नहीं बोल पाते हैं। फारसी में पाक का मतलब शुद्ध होता है। लेकिन अरबी उसे अगर बोलेंगे, तो वह फ़ाकिस्तान या बाकिस्तान हो जाएगा। फारसी वालों के पास हमेशा से प था। जब फारस पर अरबों ने फतह की तो कुछ जोड़ कर उन्होंने प और फ़ बनाने की कोशिश की थी।

फूल का गुजराती में भी कायदे से उच्चरण नहीं होता। वे उसे फ़ुल बोलते हैं। उसकी वजह यह है कि गुजरातियों के फारस से कारोबारी रिश्ते रहे। वे फ की जगह फ़ कहते हैं। लेकिन उसी से फूल का असली मतलब नहीं आ पाता। संस्कृत में फ़ है ही नहीं। हिंदी में नुक्ता लगाकर काम चलाया जा सकता है। गुलज़ार का नाम फूल से ही आया है। वह फारसी लिपि में ही लिखते हैं। उनका मानना है कि इस तरह के तमाम शब्दों को हमें नुक्ता लगाकर इस्तेमाल कर लेना चाहिए। ये ध्वनियां वर्णमाला से गायब हैं, लेकिन भाषा में तो हैं ही।

प्लैटो को हिंदुस्तान में लोग उनके खूबसूरत नाम अफलातून से जानते हैं। लेकिन प्लैटो अफलातून कैसे हो गए? दरअसल, ग्रीक में उनका नाम प्लैटोन है। अंगरेजी में वह लैटिन के जरिए आया और न गायब हो गया। हमने उसे मुसलमानों से लिया। अब अरबी में प है नहीं। तो उनका नाम फ़ से शुरू हुआ। लेकिन फ़ला बोलने में दिक्कत होती थी, सो, उसे आसान करने के लिए अ लगा दिया गया और प्लैटोन या प्लैटो हो गए अफ़लातून।

वी. एस. नैपॉल किंवदंतियां गढ़ने में माहिर हैं। उन्हें वे खट से अपनी थ्योरी से जोड़ देते हैं। उनकी किताब ‘ओवरक्राउडेड बैराकून’ में उसकी मिसाल मिलती है। उन्होंने एक उत्तर भारतीय प्रोफेसर का जिक्र किया है। वह कहते थे, ‘हम इशेक्सपीयर से शुरू करते हैं। फिर द रोमांटिक्स हैं इशैली और इसोमरसेट मॉम।’ यह हो ही नहीं सकता कि कोई उत्तर भारतीय स और श को इस तरह बोले। यह तो हिंदी में खूब बोले जाते हैं। नेपॉल ने एक और शख्स का जिक्र किया है। वह स्टेटस को इस्टेटस बोल रहा था।

और यह सही है। इसी तरह के कुछ और शब्द उन्हें मिल सकते हैं। मसलन, स्कूल को इस्कूल या स्टेशन को इस्टेशन। शायद यही सोच कर उन्होंने अंदाज लगा लिया कि स या श से जुड़े हर शब्द के साथ इ लग जाएगा। फिर उन्होंने लोगों के नाम जोड़ कर कहानी बना दी।

तब उत्तर भारतीय इस्कूल या इस्टेटस क्यों कहते हैं? उर्दू में संयुक्त अक्षर नहीं हैं। संस्कृत की तरह वहां स्कंद या स्तुति लिखने में दिक्कत आती है। अब उसे वे सकूल कह सकते हैं। लेकिन उसे आसान करने के लिए अ या इ लगा देते हैं। अस्कूल या इस्कूल। आम आदमी को फ़ बोलने में दिक्कत आती है। इसलिए वह फोरेन या फिल्म बोलता है। ज्यादा पढ़े-लिखे लोग उन पर हंसते हैं। लेकिन कोई हम पर भी तो हंस सकता है।

हम दर्शन को फ़िलोसॉफी बोलते हैं। लेकिन पुरानी ग्रीक में हिंदी वाला फ चलता है। सो, प्लैटो ने अपने काम को कहा होता फिलोसॉफी। उससे कुछ गंवई होने का एहसास तो होता, लेकिन वह हमें कम डराता-धमकाता। हमारे लिए बेहद आसान होता। क्या यह मुमकिन है कि हम जिस शब्द को गलत बोल रहे हैं, उसका सही अर्थ जान लें? मुझे तो नहीं लगता।

प्लैटो ने अपनी किताब ‘कैट्रिलस’ में उसका जिक्र किया है। ग्रीक में उस किताब का नाम है क्रैटलस। वहां पर वाई नहीं है। उसी तरह से लैटिन में सी नहीं है। इसीलिए रोमन में जो सिसरो है वह हुआ केकेरो। हम जिसे सीजर बोलते हैं वह ग्रीक में हुआ केसर या जर्मन में कैसर और स्पेनिश में चीजारे। हमारे सीजर से चीजारे उसके ज्यादा आसपास है।

हम अपने कोर्ट कचहरी के मामलों में कहते हैं कि मामला सबज्युडिस है। वह असल में सब ज्यू डिके है। ग्रीक के डिके से निकला हुआ। वहां उसका मतलब है न्याय। अब कानून की शब्दावली के लिए लैटिन की जानकारी जरूरी है। उसे हमारी निचली अदालतों वाले नहीं जानते।

कभी-कभी गलत उच्चरण इतिहास की धारा भी बदल देता है। मोजेज ने अल्लाह से पूछा, ‘आपका नाम क्या है?’ उन्होंने जवाब दिया, ‘याह वेह।’ यानी अल्लाह ने कहा, ‘मैं जो हूं सो हूं।’ यानी हमारा जो हूं, वो हूं। अब य बोलने में दिक्कत होती थी। जैसे मलयालियों को होती है। वह य को ज ही बोलते हैं। सो, याह वेह हो गए जे हो वा। जेहोवा का कोई मतलब नहीं है। लेकिन वह एक नाम है।

उसने सीमेटिक ईश्वर को नाम और लिंग दोनों दे दिया। वह ईश्वर सबके लिए था। लेकिन वह गायब हो गया। उसकी जगह एक दाढ़ी वाला ईश्वर आ गया। वह यहूदी कायदे कानून की बात करने लगा। वह ईर्ष्या और गुस्सा करता था। उसका धर्म न मानने वालों, समलैंगिकों और औरतों को वह बर्दाश्त नहीं कर पाता था।

जिन्ना भी खुद को मसीहाई अंदाज में देखते थे। उन्होंने अपना जन्मदिन ही बदल कर 25 दिसंबर कर लिया था। ताकि वह उसे क्रिसमस के साथ मना सकें। जिन्ना का अपने आपमें कोई मतलब नहीं है। दरअसल, छोटे के लिए गुजराती शब्द झिन्हु है। मैंने एक बार जिन्ना के इंटरव्यू का अनुवाद किया था। 1916 में उन्होंने उसे ‘विसमी सदी’ पत्रिका को दिया था। उसमें मैंने कुछ चीजें देखी थीं।

जिन्ना ने इंटरव्यू के आखिर में अपने दस्तखत किए थे। वहां उन्होंने ज की जगह झ का इस्तेमाल किया था। वह झिन्हू से ही आया था। क्या मुसलमानों का उनके लिए रवैया बदल जाता, अगर वे जानते कि जिन्ना का मतलब छोटा होता है? मुझे नहीं लगता। लेकिन उनके पिता ने उनका नाम जिन्ना यानी छोटा क्यों रखा? दरअसल, गुजरात में जो बच्चे बीमार पैदा होते हैं, उनका इसी तरह का नाम रख दिया जाता है ताकि मौत से उसे बचा सकें। लेकिन नाम तो नाम है। मतलब और मायने बाद की बात है।

लेखक हिल रोड मीडिया के निदेशक हैं

  • Hindi Newsसे जुडी अन्य ख़बरों की जानकारी के लिए हमें पर ज्वाइन करें और पर फॉलो करें
  • Web Title:प्लैटो कैसे हो गए अफलातून