डार्विनवाद: जो जीवै सो खेलै फाग - डार्विनवाद: जो जीवै सो खेलै फाग DA Image
7 दिसंबर, 2019|10:19|IST

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डार्विनवाद: जो जीवै सो खेलै फाग

बारह फरवरी, 200से पूरी दुनिया में वैज्ञानिक-दार्शनिक चार्ल्स डार्विन की दूसरी जन्मशती के समारोह की शुरुआत हुई। इसी वर्ष नवम्बर में डार्विन की विख्यात कृति ‘दि ओरिान ऑफ स्पीशीा’ (प्रजातियों का उद्भव) के प्रकाशन को भी 150 वर्ष पूर होंगे। पृथ्वी पर ईश्वरीय नहीं, बल्कि भौतिक नियमों की तहत अलग-अलग भूखंडों पर जीवन के उद्भव और क्रमिक विकास पर डार्विन के क्रांतिकारी विचारों ने मनुष्य को ईश्वर की श्रेष्ठ कृति मानने वाले समाज और धर्मगुरुओं के बीच गहरी प्रतिक्रिया पैदा की। ‘दि ओरिान ऑफ स्पीशीा’ की लोकप्रियता इसी बात से कूती जा सकती है कि इसका (मात्र 1250 प्रतियों का) पहला संस्करण छापेखाने से बाहर आते ही चंद घण्टों में बिक गया था। और 1876 तक इंग्लैण्ड के पाठक इसकी 16000 प्रतियाँ खरीद चुके थे। अपने यहाँ तुलसी, कबीर, निराला, अज्ञेय से लेकर पश्चिम में गैलीलियो तथा डार्विन तक लीक से हट कर सोचने-लिखने वालों में हमेशा एक दुर्दम्य छटपटाहट और एक घुमंतू परिवार और व्यवस्था विमुखता होती है। 1वीं सदी में इंग्लैण्ड के एक सम्पन्न परिवार में जन्मे डार्विन को भी परिवारान शुरुआत में एक नाकारा फितूरी ही मानते रहे। शिष्ट समाज और सम्पन्न परिवारों में आमतौर से लीक छोड़ कर चलना आसानी से सहन नहीं किया जाता। लेकिन इतिहास गवाह है, कि जोखिमपसंद यायावरी से ही वह ऊरा भी निकलती है, जो हर राज-समाज में बासी पड़ चुके विचारों का ठहराव तोड़ कर एक नई बौद्धिकता का गंगावतरण कराती है। डार्विन हों या (उनसे ठीक चार सौ बरस पहले जन्मे) गैलीलियो, या (डार्विन की ही जन्मतिथि पर जन्मे) अब्राहम लिंकन, इन सभी में स्वीकृत सामाजिकता और दर्शन के प्रति एक लगभग रूखी उपेक्षा का भाव और नए विचारों के प्रति एक गहरी रुझान है। ऐसे लोगों के विचारों का प्रवाह स्थिर और स्थायी सभ्यताओं को जब प्लावित करता है, तो उनकी परम्परा में एक विचित्र रूपांतरण शुरू होता है। और बिल्कुल नए सन्दर्भ बनते हैं। भूमण्डलीकरण ने जब पूर विश्व को बाजारों और सूचना-संचार माध्यमों से जोड़ा, तो सात समुद्र और हिमालय, आल्प्स पर्वत बेमतलब हो गए। हमार राजनेताओं और कारपोरट जगत को पहली बार विकसित दुनिया से बराबरी के धरातल पर खड़े हो नजरं मिलाकर बात करने का नायाब मौका मिला। लेकिन यदि हम भारत के बार में कहें, कि हमने ग्लोबलाक्षेशन के अवतरण की चुनौतियों का सफलता से सामना करके देश का राज-समाज लगातार बदला है और इसी कारण हमने दूसरों पर बढ़त कायम कर ली तो अनुभव की कसौटी पर यह दावा पोला है। सच तो यह है, कि हमार यहाँ के औसत जन ने चुनौतियों का सामना जिस ईमानदार जिंदादिली और खुलेपन के साथ किया है, राजनीति, प्रशासन और अर्थजगत ने नहीं। हम कहते जरूर रहे हैं कि हम एक बहुत सबल और समृद्ध परंपरा वाले लोग हैं, लेकिन चुनौती की घड़ी जब आई तो हम सींग-पूँछ छुपा कर पुन: घोंघाबसन्त जा बनने में ही भलाई मानते दिखते हैं। हमारी राष्ट्रीय यादों के गोदाम में नई शुरुआत और प्रतिक्रिया की ऐसी कोई मिसालें हमें नहीं मिल पा रही हैं, जिनसे सबक लेकर हम बदले समय के साथ तालमेल बिठा कर एक नया भविष्य गढ़ सकें। लिहाजा न्यूयार्क में वॉल स्ट्रीट के पतन पर हम हक्काबक्का हैं। उदार अर्थव्यवस्था को कोस रहे हैं। पर माक्र्सवादी अपनी लाल किताब से या दक्षिणपंथी अपने स्वदेशी फलसफे से पुरानी मिश्रित अर्थव्यवस्था की तारीफ में चाहे जितने उद्धरण हवा में उछालें, सच यही है, कि न तो उनके नियमों के अनुसार आज के वक्त में अर्थनीति को फिर से राष्ट्रीय सीमाओं से बाँधा जा सकता है, और न ही मध्यकालीन सोच की खोह में घुस कर शेष दुनिया की नारों से भारत और उसके समाज को ओझल किया जा सकेगा। आज की दुनिया एक परस्पर निर्भर सभ्यता है। युद्ध का अर्थ आज विश्वयुद्ध है और आतंकवाद से मुठभेड़ का मतलब आज अंतरराष्ट्रीय सुरक्षा चक्र से जुड़ना है। इन सचाइयों को जो देश स्वीकार नहीं करगा, वह डायनॉसोर जसी महाकाय प्रजाति होते हुए भी अंतत: खत्म हो जाएगा, और जो समय रहते इसे स्वीकार कर अपने को बदलाव में ढाल लेगा, वही बच रहेगा, और तरक्की करगा। बदलाव के साथ तालमेल के सार्थक उदाहरण कई हैं। महाराष्ट्र की आत्महत्या पट्टी कहे जाने वाले इलाके के तीन अर्धसाक्षर किसानों, आबा साहेब देशमुख, अनिल राठौड़ और भागोराव राठौड़ की बाबत एक स्टोरी अभी छपी है। इन तीनों ने लीक से हट कर इलाके के 20 अन्य किसानों के साथ पपीता-अनार-अंगूर तथा बीटी कपास की खेती शुरू की। ड्रिप सिंचाई तकनीक और पावर टिलर के इस्तेमाल से उन्होंने ऐसी भरपूर फसलें पैदा कीं, कि गाँव के और कई परंपरावादी किसान भी अब परंपरा और भाग्यवादिता का चक्कर छोड़ कर नई प्रयोगमुखी खेती अपना रहे हैं। इसी तरह संगठित रिटेल की नामी-गिरामी श्रृंखलाओं को बैठती देख कर कई शीतल पेय, चिप्स, बिस्कुट, चाकलेट, आयोडेक्स दंतमंजन, नूडल्स, साबुन तथा बैटरी निर्माताओं ने भी स्वीकार किया कि उनके माल की सिर्फ 6 प्रतिशत खपत करने वाली इन ऊँची दूकानों का मोह छोड़ना जरूरी है। लिहाजा वे अब छोटे शहरों और गाँवों के पान वाले जसे छोटे खुदरा विक्रेताओं की ओर मुड़ गए हैं। वे पा रहे हैं, कि उनके माल की 20 प्रतिशत से अधिक खपत करने वाले इन खोखों के मालिकों के पास अपने नियमित गाहक भी हैं और उन गाहकों की जरूरतों की बेहतर समझ भी। कंपनियाँ यह भी देख रही हैं कि औसतन हर एक लाख की आबादी के लिए देश में 345 विपणन केन्द्र हैं, जिनमें से खोखे वाली दूकानों की तादाद कुल की 15-20 प्रतिशत है। ऐसी सभी छोटी दूकानें जगरमगर मॉल्स या शॉपिंग काम्पलेक्स की बड़ी रिटेलर्स की अपेक्षा अधिक व्यवस्थित और ग्राहक-मित्र प्रमाणित हुई हैं। क्योंकि उनके ओवर-हैड्स बड़ी दूकानों की तुलना में बहुत मामूली और दाम अधिक वाजिब हैं। अगर हमारी कोई बड़ी अखरने वाली बुराई रही है तो वह यह, कि आपत्ति की घड़ी में अपनी निष्क्रियता और भाग्यवादिता से उबरने के लिए हमार बुद्धिाीवी और लीडरान ईमानदार कर्मठता दिखाने की बजाए सुहाने दार्शनिक बहाने खोजने बैठ जाते हैं। विपक्षी राजनेता ही नहीं, हिन्दी के ब्लॉग जगत और अखबारों में लिखने वाले कई कुँए के मेंढक भी इन दिनों भारतीय अर्थव्यवस्था की हालत की गैर-डार्विनवादी व्याख्या करते कूद-कूद कर कह रहे हैं, आतंकवाद की जड़ें पूँजीवाद में ही हैं। न पूँजीवाद अमीरी-गरीबी का अन्तराल बढ़ाता, न ही नाराज युवा अलकायदा के सदस्य, तालिबानी या नक्सली बनते। यहाँ वे मामले को गूढ़ रहस्यवाद से जोड़ देते हैं कि हमारी पारंपरिक विविधताओं के बावजूद हमारी अनेकता में एक दुर्लभ सांस्कृतिक एकता छिपी हुई है। इसलिए हमारी राय है, वसुधव कुटुंबकम् यानी तात्विक दृष्टि से मेंढक और व्हेल दोनों ही जलचर प्राणी हैं। फिर प्यारा कुँआ त्याग कर उदारवादी अर्थव्यवस्था और भूमण्डलीकरण के समन्दर में क्यों उतरं हम? लेकिन कहीं न कहीं हर मेंढक के ऐसे उद्गार के पीछे पूँजीवाद की सफलताओं और पश्चिमी विज्ञान-तकनीकी की तरक्की को लेकर एक गुप्त ईष्र्याभाव भी झलकता है कि काश, हम भी व्हेल होते! हम भी खुले समन्दर में तैरते? निष्क्रिय सवरेदयी सहिष्णुता नहीं, एक जिंदादिल असहिष्णुता से ही नस्लें बचती और तरक्की करती हैं। सत्यम ब्राण्ड मिलावटी पूँजीवाद हटाकर हमें अर्थव्यवस्था को सचमुच आधुनिक बनाना और बेरोगारी को हटाना है, तो हमें यथास्थितिवाद केकुॅंए के इन मेंढकों के प्रति एक स्वस्थ शत्रुभाव रखना होगा। परंपरा से चिपके रहना हमें दोपाए से चौपाया बनाता रहा है और इस बार हम न सम्भले तो अंतत: एक रीढ़विहीन अमीबा बन कर लुप्त होने से हमें कोई नहीं रोक पाएगा।

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