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फोर्स न सही, भय तो हर जगह था

चुनावी हिंसा के लिए कुख्यात बिहार ने इसबार अहिंसक मतदान का रिकार्ड बनाया। चार चरण में मतदान हुए। बूथ पर कहीं खून-खराबा नहीं हुआ। नक्सल इलाके में हिंसा की छिटपुट वारदातें हुईं। इन्हें चुनावी हिंसा के रूप में नहीं देखा जा सकता है। जबकि सुरक्षाबलों की तैनाती पिछले चुनावों की तुलना में कम की गई थी। सुरक्षा इंतजाम में लगे अधिकारियों ने सुरक्षाबलों की तादात का खुलासा नहीं किया। फिर भी यह जानकारी दी गई कि पैरा मिलिट्री फोर्स की 130 से 150 कंपनियां तैनात की गई थी। 2005 के विधानसभा चुनाव में राज्य में पारा मिलिट्री फोर्स की छह सौ कंपनियां तैनात थीं।ड्ढr ड्ढr दरअसल, यह शांति सिर्फ पुलिस फोर्स के बूते की बात नहीं थी। इसकी बुनियाद कानून-व्यवस्था में सुधार पर पड़ी है। आम लोगों का आत्मविश्वास बढ़ा है। अपराधियों का मनोबल टूटा है। संगठित आपराधिक गिरोह ध्वस्त हुए हैं। किसी बदमाश में यह हिम्मत नहीं बची है कि वह वोटरों को बूथ तक जाने से रोक दे। राजनीतिक दलों ने भी वोटों के ठेकेदारों से परहेा किया। उम्मीदवार और नेता सीधे वोटरों तक गए। तीन साल में तीस हाार अपराधियों को सजा मिलने का यह परिणाम है कि नए अपराधी डरते हैं।ड्ढr ड्ढr औसत हरेक पंचायत के चार अपराधियों को सजा मिली है। दूसरों के केयर ऑफ में रहकर वोट देनेवाला एक बड़ा समूह इसबार स्वतंत्र होकर वोट दे रहा था। अत्यंत पिछड़ों, महादलितों और अल्पसंख्यकों की पिछड़ी बिरादरी को इसी श्रेणी में रख सकते हैं। कई घटनाएं सामने आईं। इन तबकों को वोट देने से रोकने की कोशिश हुई तो ये संगठित होकर सड़क पर उतर आए।चुनाव के दिनों में हिंसा की घटनाएं एक्शन-रिएक्शन के तौर पर होती हैं। एक तबका एक्शन में आता है। वह दूसर को वोट देने से रोकता है। यह नहीं हुआ। मर्जी के मुताबिक लोगों ने वोट डाले। अपवाद को छोड़ दें तो मतदान के लिए किसी को रोकने के लिए कहीं संगठित प्रयास नहीं किया गया। पहले चरण के समय यह शिकायत मिली कि सड़क और मतदान केंद्रों पर पारा मिलिट्री फोर्स की तैनाती ठीक ढंग से नहीं की गई हैं। फिर भी शांतिपूर्ण मतदान हो गया। बाद के चरणों में ये शिकायतें कम हुईं। शायद इसलिए कि फोर्स की गैर मौजूदगी के बावजूद शासन का भय हर जगह मौजूद था।

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