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करंगे एक-दूसर को ‘लाल सलाम’

आखिरकार वामपंथी दलों ने एक दूसर को ‘लाल सलाम’ करने की ठान ही ली। दुनिया के मजदूरों के एक होने का नारा बुलंद करने वाले वामपंथी हर चुनाव में अपनी ढपली, अपना राग बजाने लगते थे। यह अद्भुत बात थी कि जब संघर्ष की बात होती थी तो तीनों वामपंथी दल एक हो जाते थे और चुनाव का मौका आते ही दावेदारी को लेकर लड़ाई शुरू हो जाती थी। नतीजा यह होता था कि वामपंथी आधार के वोट बिखरते रहे और उन्हें चुनौती देने वाले लोग मजबूत होते रहे। एकाध मौके तो ऐसे भी आए जब राजद और भाकपा उम्मीदवार बिल्कुल आमने-सामने थे लेकिन माकपा ने अपने समझौते के कारण भाकपा की बजाय राजद उम्मीदवार को समर्थन किया।ड्ढr ड्ढr लेकिन इस बार हालात बदले हैं। कामरडों के शब्दों में कहे तो उन्होंने ‘ठोस स्थितियों का ठोस विश्लेषण’ किया है और वाम मोर्चा बनाकर चुनाव लड़ने की ठानी है। भाकपा, माकपा और भाकपा माले ने तय किया है कि वे एक होकर लोकसभा का चुनाव लड़ेंगे। लम्बे समय के बाद यह मौका आया है जब वामपंथी ताकतें चुनाव के मोर्चे पर एक मंच पर उतरी हैं। भारतीय कम्युनिस्ट पार्टी के 1में हुए पहले विभाजन के बाद ऐसा मौका बिहार में नहीं आया था। अगले लोकसभा चुनाव के लिए वामपंथी दलों ने सूबे की 32 सीटों का चयन किया है। इसमें भाकपा माले सबसे अधिक 21 सीटों, भाकपा 6 सीटों और माकपा 5 सीटों पर चुनाव लड़ेंगी। शिवहर, सीतामढ़ी, किशनगंज, वैशाली, सारण, हाजीपुर, मुंगेर और औरंगाबाद ही मात्र ऐसी सीट हैं जिनपर किसी वामपंथी दल की दावेदारी नहीं होगी। इनपर समानधर्मा दलों के उम्मीदवार को समर्थन दिया जा सकता है।ड्ढr ड्ढr पिछले लोकसभा चुनाव में तीनों वामपंथी दल अपने-अपने बैनर तले चुनाव लड़े थे और बिहार में उनका खाता तक नहीं खुला था। उस चुनाव में वामपंथी ताकतों ने एक सीट गंवाई थी। भाजपा ने माकपा से भागलपुर की सीट छीनी थी। तब भाजपा के सुशील कुमार मोदी ने माकपा के सुबोध राय को पराजित किया था। उस चुनाव में माले ने 21 सीटों पर, भाकपा ने छह सीटों पर और माकपा ने एक सीट पर अपने उम्मीदवार दिए थे। उस चुनाव में लेनिनग्राद माने जाने वाले बेगूसराय जिले के बलिया लोकसभा निर्वाचन क्षेत्र में भाकपा को दूसर स्थान से संतोष करना पड़ा था। वहां से चुनाव लड़ने वाले भाकपा प्रत्याशी शत्रुघ्न प्रसाद सिंह ने कहा कि अगर सभी वामपंथी दलों ने उस समय सहयोग किया होता तो न केवल बलिया बल्कि कई दूसर लोकसभा निर्वाचन क्षेत्र भी वामपंथियों के कब्जे में होते। उनके अनुसार माकपा और भाकपा माले द्वारा सक्रिय समर्थन नहीं करने के कारण बलिया में भाकपा को 40-45 हाार वोट का नुकसान उठाना पड़ा था। ऐसा उदाहरण पिछले विधानसभा चुनाव में भी दिखाई पड़ा। बेगूसराय विधानसभा क्षेत्र में भाकपा उम्मीदवार कमली महतो की हार का कारण वहां के माकपा प्रत्याशी राजेन्द्र प्रसाद सिंह को बताया गया।ड्ढr ड्ढr वैसे माकपा के राज्य सचिव विजयकांत ठाकुर का कहना है कि लोजपा से समझौता होने के बावजूद बलिया में उनकी पार्टी ने पर्चा निकालकर भाकपा का समर्थन किया था। भाकपा माले के राज्य सचिव नंदकिशोर प्रसाद का मानना है कि तीनों वामपंथी दलों के मिलकर चुनाव लड़ने से नयी परिस्थिति बनेगी। एनडीए और यूपीए के मुकाबले लोगों के सामने एक नया मोर्चा होगा। भाकपा नेता शत्रुघ्न प्रसाद सिंह का मानना है कि उनके मिलकर चुनाव लड़ने से न केवल वामपंथी मतों का बिखराव रुकेगा बल्कि उनके गढ़ भी मजबूत होंगे। उनका कहना है कि उनका यह मोर्चा न केवल चुनाव के दौरान होगा बल्कि जनसमस्याओं को लेकर भी वे मिल-ाुलकर संघर्ष करंगे।

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