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सुरक्षा की राजनीति का सामाजिक पहलू

सुरक्षा पर हमारी सोच काफी बदली है। सुरक्षा का फिनोमिना पहले बहुत सीमित था। शत्रु के आक्रमण के समय प्रजा की सुरक्षा, आपदाओं से सुरक्षा, राज्य और प्रजा की संपत्ति की रक्षा। लकिन अब प्राथमिकताएं बदल गई हैं। पहले नंबर पर हैं राजनेता उनसे जुड़े हुए लोग। उनमें भी प्राथमिकताएं हैं। रक्त संबंधी पहले, उनके बाद उनके जिताऊ ब्रिगेड के चुनिंदा सदस्य। तीसरे पर अफसरान। जनता के वे धनी लोग जो डरे हुए रहते हैं और नेताओं को पैसा देते हैं। उनके लिए सुरक्षा रुतब की बात भी है। विशिष्टता का प्रमाण भी है। इन सब के वर्ग हैं- जेड, वाई और न जान कौन-कौन सी सुरक्षा। जब राजा असुरक्षित अनुभव करता है तो जनता कितनी असुरक्षित हो जाती है, उसका अंदाज तभी होता है जब बेगुनाह उनके और उनकी नीतियों के शिकार बन जाते हैं। सामान्य आदमी की सुरक्षा की सोच बहुत सीमित है। अधिक हुआ तो घर और खेत के चारों तरफ बाड़ लगा लेता है। जरूरत हुई तो रात को जानवरों के हमले से बचने के लिए आग जला लेता है। बीमारी-सिमारी में भी कोशिश करता है कि स्थानीय जड़ी-बूटियों से इलाज कर ले। भूख से बचन के लिए भी उसके शार्टकट्स हैं। पर वे दीर्घसूत्री नहीं हैं, लकिन ये बातें सुरक्षा के अंतर्गत नहीं आती। ये सब आत्म प्रबंधन की कोटि में आते हैं। सुरक्षा और आत्म प्रबंधन में जमीन-आसमान का फर्क है। प्रबंधन का मतलब है सीमित साधनों का यथासंभव बेहतर विभाजन करके आवश्यकताओं का समाधान करना। संभवत: राज्य की परिकल्पना मनुष्य की आपसी संवेदना और बाहरी या कहिए कबीलाई हमलों से निकली है। वही संवेदना जो आपस में एक दूसरे को जोड॥कर कबीले बनने में मदद कर रही थी, उसने छोटे राज्यों का रूप लिया और एक समाज बना उसकी जिम्मेदारियों में एक प्रमुख जिम्मेदारी यह हुई कि वह समाज मिल-जुल कर एक दूसरे की रक्षा करेगा। जीवन रक्षा ही राज्य की स्थापना के मूल में है। भूख भी है, लकिन पहला सवाल था मनुष्य सुरक्षित कैसे हो? भले ही राष्ट्र आज के बुद्धिजीवियों की नार में मात्र एक भौगोलिक इकाई हो, लकिन इसके पीछे छिपी संवेदनाएं अनदेखी नहीं की जा सकतीं। संवेदना चाहे वह भय से उपजे या प्रेम से, वह किसी भी समन्वय और जुड़ाव के लिए जरूरी है। राष्ट्र भले ही ऊपरी तौर से भौगोलिक वास्तविकता होन का अहसास कराता हो, लकिन इसका भावनात्मक अस्तित्व भी उतना ही महत्वपूर्ण है। राष्ट्र अगर केवल भौगोलिक सत्य होता तो उसके साथ संवेदनात्मक और भावनात्मक संदर्भ इतने प्रगाढ़ न हुए होते कि देशवासी बलिदान के लिए उतारू हो जाएं। भले ही बाहरी हमलों से बचाव कभी राज्य या राष्ट्र के अस्तित्व में आन का प्रस्थान बिंदु रहा हो। उसके बाद तो राष्ट्र का स्वरूप निरंतर विकसित होता गया। अब धर्मनिरपेक्षता से लेकर मानव मूल्यों की सुरक्षा तक विस्तृत क्षेत्र हो गया। मानव मूल्यों का क्षेत्र भी सीमित नहीं रहा। भूख, बीमारी, विस्थापन बेरोजगारी, दहेज, महिला एवं बाल उत्पीड़न, तेजी मंदी, दुर्घटनाएं, दैवी प्रकोप आदि सब मानवीय सुरक्षा की परिधि में आते हैं। राज्य को आंशिक रूप से या संपूर्ण रूप से दायित्व निबाहना पड़ता है। यूरोप तथा अन्य पाश्चात्य देशों में तो सामाजिक सुरक्षा के तहत पूरा दायित्व राज्य ही वहन करता है। तीसरी दुनिया के देशों में मानवीय सुरक्षा का उल्लंघन अक्सर होते हैं। उदाहरण के लिए भारत में हुकमरान की सुरक्षा सामान्य आदमी की सुरक्षा से अधिक महत्वपूर्ण और खर्चीली है। उसका सारा बोझ सामान्य आदमी पर पड़ता है। चाहे मंत्री हों या नौकरशाह या जन प्रतिनिधि सबके लिए सुरक्षा कई कारणों से अनिवार्यता की कोटि में आ गई है। उसके पीछे कुछ अनावश्यक कारण भी हैं कुछ आवश्यक भी। सबसे बड़ा कारण है भय। अपनी जनता के प्रति अविश्वास। उसे अपना अमित्र मानकर चलना। अपने आपको जनसाधारण से अलग समझना। जन प्रतिनिधि के चुने जाते ही साधारण से असाधारण हो जान की मानसिकता उनके अंदर की निर्भीकता या भाईचारे का पटाक्षेप कर देती है। इसके दा कारण मुख्य हैं। विशिष्टता का अहसास, दूसरा अतिरिक्त प्रतिष्ठा का संवहन। जिनसे प्रतिष्ठा या जिनके द्वारा प्रतिष्ठा मिलती है उन्हें याचक की नजर से देखना। अपने याचकत्व को भूलकर उनसे दूरी बढ़ाते जाना। दूरी ही आशंकाओं को जन्म देती है। भय और कुंठाएं डरपोक बना देती हैं। उसके लिए उन्हें सुरक्षाओं के घेरे पर घेरे चाहिए। उनसे बाहर आन का मतलब उनके लिए निर्वस्त्र सड॥क पर आ जाना। सुरक्षा का कवच उनके लिए ठीक वैसा ही हो जाता है जैसे नशेड़ी के लिए नशा। सामान्य आदमी क्या करे? वह अंतत: असुरक्षा को ही अपना कवच मानकर चलता है। मरना होगा तो मर जाएंगे, डर से जीना तो बंद नहीं कर सकते। यही भाव सताए जा रहे लोगों की सोच का हिस्सा बन जाता है और उस बलिदानी की मानसिकता का भी हिस्सा होता है जिसने किसी बड़े उद्देश्य के लिए अपन को न्यौछावर करन का निर्णय लिया हुआ है। व्यवहार की दृष्टि से दोनों के रवैये भले ही अलग हों, निष्कर्ष कमोबेश समान होते हैं। एक के लिए मृत्यु, दूसरे के लिए बलिदान। भय और साहस में भले ही अंतर हो पर भौतिक अंत न चाहते हुए भी कई बार एक सा ही होता है। भय नितांत एक निजी और अंतरंग भाव है। उससे बचन के लिए विश्वास की जरूरत होती है। विश्वास कैसे आए? सुदृढ़ शासन व्यवस्था। भेदभाव विहीन पारदर्शिता। राज्य ही सामान्य व्यक्ित के विश्वास का संबल बन सकता है। चाहे बाहरी हमला हो या अंदर की ताकतों का भय। उन सबका सामना आत्म विश्वास और पारदर्शिता के द्वारा ही किया जा सकता है। सत्ता का सबसे बड़ा और सक्षम उपकरण भय है। भय की छाया को घनी व सर्वव्यापी बनान के माध्यम दिन पर दिन जुड़ते जाते हैं। गांधी इसीलिए भयमुक्त होन की बात करते हैं। क्या कोई ऐसा राज्य अस्तित्व में है जो सामान्य स्थितयों में अपने समाज को भयमुक्त होन की गारंटी देन की स्थिति में हो। बाहरी आक्रमण से सुरक्षा की जिम्मेदारी भी राज्य इसलिए लेते हैं कि सत्ता की अक्षुण्णता बनी रहे, लकिन राज्य में अंतरंग सुरक्षा, न्याय में तटस्थता और निरपेक्षता बाहरी तौर पर बनी रहती हैं। उनके बारे में शंकाएं बरकरार रहती हैं। नतीजा क्या होगा? सुरक्षा के प्रति विश्वास बना रहे इसके संभव आधार 1़ भय से मुक्ित।2़ अभावों से मुक्ित। 3़ नागरिक अधिकारों की अक्षुण्णता। 4़ धर्म जाति लिंग भाषा आदि को तर्कसंगत संरक्षण। 5़ अधिकारों की समानता। 6़ अपराधों का शिक्षा द्वारा उन्मूलन, जरूरत पड़े तो दंड योजना का प्रभावी प्रयोग। यह तभी संभव है जब राज्य संविधान को ढ़ता और बिना भेदभाव से लागू करे। उसमें हर नागरिक की आस्था हो। वह शिक्षा से और वरिष्ठ जनों के आचरण के द्वारा अभिमंत्रित हो। लेखक वरिष्ठ साहित्यकार हैं।

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